Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1171 (hindi)
ਕਾਹੇ ਕਲਰਾ ਸਿੰਚਹੁ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਹੁ ॥
( हे ब्राहमण ! मूर्ति और तुलसी की पूजा करके) तू अपना जनम (व्यर्थ) गवा रहा है (तेरा यह उद्यम यूँ ही है जैसे कोई किसान कलॅर धरती को पानी दिए जाए।
ਕਾਚੀ ਢਹਗਿ ਦਿਵਾਲ ਕਾਹੇ ਗਚੁ ਲਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कलॅर में फसल नहीं उगेगी) तू व्यर्थ ही कलॅर को सींच रहा है। (गारे की) कच्ची दीवार (अवश्य ही) ढहि जाएगी (अंदरूनी आचरण को बिसार के तू बाहर तुलसी आदि की पूजा कर रहा है। तू तो गारे की कच्ची दीवार पर) चूने का पलस्तर व्यर्थ ही कर रहा है। 1। रहाउ।
ਕਰ ਹਰਿਹਟ ਮਾਲ ਟਿੰਡ ਪਰੋਵਹੁ ਤਿਸੁ ਭੀਤਰਿ ਮਨੁ ਜੋਵਹੁ ॥
(किसान अपने खेत के क्यारे सींचने के लिए अपने कूँए में रहट लगवाता है। बैल जोह के कूएं को चलाता है और पानी से क्यारे भरता है। इसी तरह हे ब्राहमण !) हाथों से सेवा करने को रहट और रहट की माला और उस माला में डब्बों (टिंडों) का जोड़ बना। (हाथों से सेवा वाले घड़े की माला वाले कूँएं) में अपना मन जोह।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਿੰਚਹੁ ਭਰਹੁ ਕਿਆਰੇ ਤਉ ਮਾਲੀ ਕੇ ਹੋਵਹੁ ॥੨॥
आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल सींच के अपनी ज्ञानेन्द्रियों के क्यारे इस नाम-जल से नाको-नाक भर। तब तू इस जगत-बाग़ के पालनहार प्रभू का प्यारा बनेगा। 2।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਦੁਇ ਕਰਹੁ ਬਸੋਲੇ ਗੋਡਹੁ ਧਰਤੀ ਭਾਈ ॥
(किसान उगी हुई खेती को खुरपी से गोडता है। फसल के हरेक पौधे को प्यार से संभाल के बचाता जाता है। और फालतू घास-बूटी नदीन को। मानो। गुस्से से बार उखाड़-उखाड़ के फेंकता जाता है। तू भी) हे भाई ! अपनी शरीर-धरती को गोड़। प्यार और गुस्सा ये दो खुरपे बना (दैवी-गुणों को प्यार से बचाए रख। विकारों को गुस्से से जड़ से उखाड़ता जा)।
ਜਿਉ ਗੋਡਹੁ ਤਿਉ ਤੁਮੑ ਸੁਖ ਪਾਵਹੁ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਈ ॥੩॥
ज्यों-ज्यों तू इस तरह गोड़ी करेगा। त्यों-त्यों आत्मिक सुख पाएगा। तेरी की हुई यह मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी। 3।
ਬਗੁਲੇ ਤੇ ਫੁਨਿ ਹੰਸੁਲਾ ਹੋਵੈ ਜੇ ਤੂ ਕਰਹਿ ਦਇਆਲਾ ॥
हे प्रभू ! हे दयालु प्रभू ! अगर तू मेहर करे तो (तेरी मेहर से मनुष्य पाखण्डी) बगुले से सुंदर हँस बन सकता है।
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਦਇਆ ਕਰਹੁ ਦਇਆਲਾ ॥੪॥੧॥੯॥
तेरे दासों का दास नानक विनती करता है (और कहता है कि) हे दयालु प्रभू ! मेहर कर (और बगुले से हँस करने वाला अपना नाम बख्श)। 4। 1। 9।
ਬਸੰਤੁ ਮਹਲਾ ੧ ਹਿੰਡੋਲ ॥
बसंतु महला १ हिंडोल॥
ਸਾਹੁਰੜੀ ਵਥੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸਾਝੀ ਪੇਵਕੜੈ ਧਨ ਵਖੇ ॥
आत्मिक जीवन की दाति जो पति-प्रभू की तरफ से मिली थी वह तो सबके साथ बाँटी जा सकने वाली (सांझी) थी। पर जगत-पेके घर में रहते हुए (माया के मोह के प्रभाव तले) मैं जीव-स्त्री भेद-भाव ही सीखती रही।
ਆਪਿ ਕੁਚਜੀ ਦੋਸੁ ਨ ਦੇਊ ਜਾਣਾ ਨਾਹੀ ਰਖੇ ॥੧॥
मैं स्वयं ही कुचॅजी रही। (भाव। मैंने सुंदर जीवन-जुगति ना सीखी। इस कुचॅज में दुख सहेड़े हैं। पर) मैं किसी और पर (इन दुखों के लिए) कोई दोष नहीं लगा सकती। (पति-प्रभू द्वारा मिली आत्मिक जीवन की दाति को) संभाल के रखने की मुझे जाच नहीं आई। 1।
ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਹਉ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ॥
हे मेरे मालिक-प्रभू ! मैं स्वयं ही (माया के मोह की) भटकना में पड़ के जीवन के सही रास्ते से भटकी हुई हूँ।
ਅਖਰ ਲਿਖੇ ਸੇਈ ਗਾਵਾ ਅਵਰ ਨ ਜਾਣਾ ਬਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(माया के मोह में फस के जितने भी कर्म मैं जन्मों-जन्मांतरों से करती आ रही हूँ। उनके जो) संस्कार मेरे मन में उकरे हुए हैं। मैं उनको गाती चली जा रही हूँ (उनकी ही प्रेरणा से बार-बार वैसे ही कर्म करती जा रही हूँ) मैं (मन की) कोई घाड़त (घड़नी) नहीं जानती हूँ (मैं कोई ऐसा कर्म करना नहीं जानती जिनसे मेरे अंदर से माया के मोह के संस्कार समाप्त हो)। 1। रहाउ।
ਕਢਿ ਕਸੀਦਾ ਪਹਿਰਹਿ ਚੋਲੀ ਤਾਂ ਤੁਮੑ ਜਾਣਹੁ ਨਾਰੀ ॥
जो जीव-सि्त्रयाँ शुभ-गुणों के सुंदर चित्र (अपने मन में बना के) प्रेम-पटोला पहनती हैं उनको ही सुचॅजियाँ (सदाचारी) सि्त्रयाँ समझो।
ਜੇ ਘਰੁ ਰਾਖਹਿ ਬੁਰਾ ਨ ਚਾਖਹਿ ਹੋਵਹਿ ਕੰਤ ਪਿਆਰੀ ॥੨॥
जो सि्त्रयाँ अपने (आत्मिक जीवन का) घर संभाल के रखती हैं कोई विकार कोई बुराई नहीं चखतीं (भाव। जो बुरे रसों में प्रवृत नहीं होतीं) वे पति-प्रभू को प्यारी लगती हैं। 2।
ਜੇ ਤੂੰ ਪੜਿਆ ਪੰਡਿਤੁ ਬੀਨਾ ਦੁਇ ਅਖਰ ਦੁਇ ਨਾਵਾ ॥
हे भाई ! अगर तू सचमुच पढ़ा-लिखा विद्वान है समझदार है (तो यह बात पक्की तरह समझ ले कि संसार-समुंद्र के विकारों के पानियों में से पार लांघने के लिए) हरी-नाम ही बेड़ी है।
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਏਕੁ ਲੰਘਾਏ ਜੇ ਕਰਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਾਂ ॥੩॥੨॥੧੦॥
नानक विनती करता है कि हरी-नाम ही (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है और मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू के नाम में टिका रहूँ। 3। 2। 10।
ਬਸੰਤੁ ਹਿੰਡੋਲ ਮਹਲਾ ੧ ॥
बसंतु हिंडोल महला १॥
ਰਾਜਾ ਬਾਲਕੁ ਨਗਰੀ ਕਾਚੀ ਦੁਸਟਾ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੋ ॥
हे पण्डित ! (अगर कोई विचार की बात करनी है तो) यह सोचो कि (शरीर-नगरी पर) राज करने वाला मन अंजान है। यह शरीर-नगर भी कच्चा है (बाहर से विकारों के हमलों का मुकाबला करने के योग्य नहीं है क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ कमजोर हैं)। (फिर इस अंजान मन का) प्यार भी कामादिक बुरे साथियों के साथ ही है।
ਦੁਇ ਮਾਈ ਦੁਇ ਬਾਪਾ ਪੜੀਅਹਿ ਪੰਡਿਤ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥੧॥
इसकीी माताएँ भी दो सुनी जाती हैं (बुद्धि और अविद्या)। इसके पिता भी दो ही बताए जाते हैं (परमात्मा और माया ग्रसित जीवात्मा। आम तौर पर यह अंजान मन अविद्या और माया-ग्रसित जीवात्मा की बातों में आया रहता है)। 1।
ਸੁਆਮੀ ਪੰਡਿਤਾ ਤੁਮੑ ਦੇਹੁ ਮਤੀ ॥
हे पंडित जी महाराज ! तुम तो और ही तरह की शिक्षा दे रहे हो।
ਕਿਨ ਬਿਧਿ ਪਾਵਉ ਪ੍ਰਾਨਪਤੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(ऐसी दी हुई मति के साथ) मैं अपने प्राणों के मालिक परमात्मा को कैसे मिल सकता हूँ। 1। रहाउ।
ਭੀਤਰਿ ਅਗਨਿ ਬਨਾਸਪਤਿ ਮਉਲੀ ਸਾਗਰੁ ਪੰਡੈ ਪਾਇਆ ॥
(हे पण्डित ! तू तो और ही किस्म की शिक्षा दे रहा है। तेरी दी हुई शिक्षा से अंजान मन को) यह समझ नहीं आती कि शीतलता (-शांति) और ईश्वरीय-तेज दोनों मनुष्य के शरीर के अंदर मौजूद हैं। (समझ ना आ सकने का कारण यह है कि) शरीर के अंदर विकारों की आग (मची हुई है) जवानी भी लहरें ले रही है (जैसे हरी-भरी वनस्पति के अंदर आग छुपी रहती है)।
ਚੰਦੁ ਸੂਰਜੁ ਦੁਇ ਘਰ ਹੀ ਭੀਤਰਿ ਐਸਾ ਗਿਆਨੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੨॥
मायावी वासना का समुंद्र इस शरीर के अंदर ठाठा मार रहा है (मानो। समुंदर एक गाँव में छुपा हुआ है। सो। शिक्षा तो वह चाहिए जो इस अंदरूनी बाढ़ को रोक सके)। 2।
ਰਾਮ ਰਵੰਤਾ ਜਾਣੀਐ ਇਕ ਮਾਈ ਭੋਗੁ ਕਰੇਇ ॥
वही मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता समझा जा सकता है जो (बुद्धि और अविद्या- दो माताओं में से) एक माँ (अविद्या को) समाप्त कर दे।
ਤਾ ਕੇ ਲਖਣ ਜਾਣੀਅਹਿ ਖਿਮਾ ਧਨੁ ਸੰਗ੍ਰਹੇਇ ॥੩॥
(जो मनुष्य अविद्या माता का समाप्त कर देता है) उसके (रोजाना जीवन के) लक्षण ये दिखते हैं कि वह दूसरों की ज्यादतियाँ ठंडे-जिगर से सहने का आत्मिक धन (सदा) इकट्ठा करता है। 3।
ਕਹਿਆ ਸੁਣਹਿ ਨ ਖਾਇਆ ਮਾਨਹਿ ਤਿਨੑਾ ਹੀ ਸੇਤੀ ਵਾਸਾ ॥
(हे प्रभू ! तेरे) दासों का दास विनती करता है (कि इन्सानी मन बेबस है) इसका संग सदा उन (ज्ञानेन्द्रियों) के साथ रहता है जो कोई शिक्षा सुनते ही नहीं हैं और जो विषौ-विकारों से कभी तृप्त भी नहीं होते।
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਖਿਨੁ ਤੋਲਾ ਖਿਨੁ ਮਾਸਾ ॥੪॥੩॥੧੧॥
(यही कारण है कि यह मन) कभी तोला हो जाता है। कभी मासा रह जाता है (कभी मुकाबला करने की हिम्मत करता है और कभी घबरा जाता है)। 4। 3। 11।
ਬਸੰਤੁ ਹਿੰਡੋਲ ਮਹਲਾ ੧ ॥
बसंतु हिंडोल महला १॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹੁ ਗੁਰੂ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਭੁਖ ਗਵਾਏ ॥
गुरू ऐसा शाहु है जिसके पास प्रभू के नाम का धन सदा ही टिका रहता है। (इस वास्ते) गुरू सुख देने के समर्थ है। गुरू प्रभू के साथ मिला देता है। और माया इकट्ठी करने की भूख मनुष्य के मन में से निकाल देता है।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੧॥
गुरू मेहर करके (शरण आए सिख के मन में) प्रभू को मिलने की तमन्ना पक्की कर देता है (क्योंकि गुरू स्वयं) हर वक्त परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है (अपनी सुरति सदा प्रभू की सिफत-सालाह में टिकाए रखता है)। 1।
ਮਤ ਭੂਲਹਿ ਰੇ ਮਨ ਚੇਤਿ ਹਰੀ ॥
हे (मेरे) मन ! परमात्मा को (सदा) याद रख। (देखना। माया की भूख में फस के) कहीं (उसको) भुला ना देना।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨਾਹੀ ਤ੍ਰੈ ਲੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(पर) गुरू की शरण पड़ने से ही परमात्मा का नाम मिलता है। गुरू की शरण पड़े बिना माया की भूख से खलासी नहीं हो सकती (भले ही) तीनों लोकों में ही (दौड़-भाग कर के देख ले)। (इस वास्ते। हे मन ! गुरू का पल्ला पकड़)। 1। रहाउ।
ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਨਹੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਨਹੀ ਭਗਤਿ ਹਰੀ ॥
दिली-आकर्षण के बिना सतिगुरू भी नहीं मिलता (भाव। गुरू की कद्र नहीं पाई जा सकती)। और भाग्यों के बिना (पिछले संस्कारों की राशि-पूँजी के बिना) प्रभू को मिलने की तमन्ना (मन में) नहीं उपजती।
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਸਤਸੰਗੁ ਨ ਪਾਈਐ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ॥੨॥
(पिछले संस्कारों की राशि-पूँजी वाले) भाग्यों के बिना गुरमुखों की संगति नहीं मिलती (भाव। सत्संग की कद्र नहीं पड़ सकती)। प्रभू की अपनी मेहर के साथ ही उसका नाम प्राप्त होता है। 2।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਗੁਪਤੁ ਉਪਾਏ ਵੇਖੈ ਪਰਗਟੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ॥
जो प्रभू स्वयं सारी सृष्टि पैदा करता है और उसकी संभाल करता है। वह हरेक शरीर में छुपा बैठा है। गुरू की शरण पड़ने वाले संत-जनों को वह हर जगह प्रत्यक्ष दिखाई देने लग जाता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਹਿ ਸੁ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭੀਨੇ ਹਰਿ ਜਲੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮਨਾ ॥੩॥
वह संत जन सदा प्रभू का नाम जपते हैं। और उसके प्यार-रंग में मस्त रहते हैं। उनके मन में प्रभू का आत्मिक जिंदगी देने वाला नाम-जल सदा बसता रहता है। 3।