Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1160 (hindi)
ਹੈ ਹਜੂਰਿ ਕਤ ਦੂਰਿ ਬਤਾਵਹੁ ॥
(हे मुल्ला !) रॅब हर जगह हाजर-नाज़र है। तुम उसको दूर (किसी सातवें आसमान पर) क्यों (बैठा) बताते हो।
ਦੁੰਦਰ ਬਾਧਹੁ ਸੁੰਦਰ ਪਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अगर उस सुंदर रॅब को मिलना है। तो कामादिक शोर डालने वाले विकारों को काबू में रखो। 1। रहाउ।
ਕਾਜੀ ਸੋ ਜੁ ਕਾਇਆ ਬੀਚਾਰੈ ॥
असली काज़ी वह है जो अपने शरीर को खोजे।
ਕਾਇਆ ਕੀ ਅਗਨਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਜਾਰੈ ॥
शरीर में प्रभू की ज्योति को रौशन करे।
ਸੁਪਨੈ ਬਿੰਦੁ ਨ ਦੇਈ ਝਰਨਾ ॥
सपने में भी काम की वासना मन में ना आने दे।
ਤਿਸੁ ਕਾਜੀ ਕਉ ਜਰਾ ਨ ਮਰਨਾ ॥੨॥
ऐसे काज़ी को बुढ़ापे और मौत का डर नहीं रह जाता। 2।
ਸੋ ਸੁਰਤਾਨੁ ਜੁ ਦੁਇ ਸਰ ਤਾਨੈ ॥
असल सुल्तान (बादशाह) वह है जो (ज्ञान और वैराग के) दो तीर तानता है।
ਬਾਹਰਿ ਜਾਤਾ ਭੀਤਰਿ ਆਨੈ ॥
बाहरी दुनियाँ के पदार्थों की ओर भटकते मन को अंदर की ओर मोड़ लेता है।
ਗਗਨ ਮੰਡਲ ਮਹਿ ਲਸਕਰੁ ਕਰੈ ॥
प्रभू-चरणों में जुड़ के अपने अंदर भले गुण पैदा करता है।
ਸੋ ਸੁਰਤਾਨੁ ਛਤ੍ਰੁ ਸਿਰਿ ਧਰੈ ॥੩॥
वह सुल्तान अपने सिर पर (असल) छत्र झुलवाता है। 3।
ਜੋਗੀ ਗੋਰਖੁ ਗੋਰਖੁ ਕਰੈ ॥
जोगी (प्रभू को विसार के) गोरख-गोरख जपता है।
ਹਿੰਦੂ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਚਰੈ ॥
हिन्दू (श्री रामचंद्र जी की मूर्ति में ही मिथे हुए) राम का नाम उचारता है।
ਮੁਸਲਮਾਨ ਕਾ ਏਕੁ ਖੁਦਾਇ ॥
मुसलमान ने (सातवें आसमान में बैठा हुआ) निरा अपना (मुसलमानों का ही) रॅब मान रखा है।
ਕਬੀਰ ਕਾ ਸੁਆਮੀ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੪॥੩॥੧੧॥
पर मेरा कबीर का प्रभू वह है। जो सबमें व्यापक है (और सबका सांझा है)। 4। 3। 11।
ਮਹਲਾ ੫ ॥
महला ५॥
ਜੋ ਪਾਥਰ ਕਉ ਕਹਤੇ ਦੇਵ ॥
जो मनुष्य पत्थर (की मूर्ति) को ईश्वर कहते हैं।
ਤਾ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਹੋਵੈ ਸੇਵ ॥
उनकी की हुई सेवा व्यर्थ जाती है।
ਜੋ ਪਾਥਰ ਕੀ ਪਾਂਈ ਪਾਇ ॥
जो मनुष्य पत्थर (की मूर्ति) के पैरों में नत्मस्तक होते हैं।
ਤਿਸ ਕੀ ਘਾਲ ਅਜਾਂਈ ਜਾਇ ॥੧॥
उनकी मेहनत बेकार चली जाती है। 1।
ਠਾਕੁਰੁ ਹਮਰਾ ਸਦ ਬੋਲੰਤਾ ॥
हमारा ठाकुर सदा बोलता है।
ਸਰਬ ਜੀਆ ਕਉ ਪ੍ਰਭੁ ਦਾਨੁ ਦੇਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वह प्रभू सारे जीवों को दातें देने वाला है। 1। रहाउ।
ਅੰਤਰਿ ਦੇਉ ਨ ਜਾਨੈ ਅੰਧੁ ॥
अंधा मूर्ख अपने अंदर बसते रॅब को नहीं पहचानता।
ਭ੍ਰਮ ਕਾ ਮੋਹਿਆ ਪਾਵੈ ਫੰਧੁ ॥
भ्रम का मारा हुआ और-और जाल बिछाता है।
ਨ ਪਾਥਰੁ ਬੋਲੈ ਨਾ ਕਿਛੁ ਦੇਇ ॥
यह पत्थर ना बोलता है। ना कुछ दे सकता है।
ਫੋਕਟ ਕਰਮ ਨਿਹਫਲ ਹੈ ਸੇਵ ॥੨॥
(इसको स्नान करवाने और भोग आदि लगवाने के) सारे काम व्यर्थ हैं। (इसकी सेवा में से कोई फल नहीं मिलता)। 2।
ਜੇ ਮਿਰਤਕ ਕਉ ਚੰਦਨੁ ਚੜਾਵੈ ॥
यदि कोई मनुष्य मुर्दे को चंदन (रगड़ के) लगा दे।
ਉਸ ਤੇ ਕਹਹੁ ਕਵਨ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥
उस मुर्दे को (इस सेवा का) कोई फल नहीं मिल सकता। और।
ਜੇ ਮਿਰਤਕ ਕਉ ਬਿਸਟਾ ਮਾਹਿ ਰੁਲਾਈ ॥
यदि कोई मुर्दे को विष्टा में पलीत कर दे।
ਤਾਂ ਮਿਰਤਕ ਕਾ ਕਿਆ ਘਟਿ ਜਾਈ ॥੩॥
तो भी उस मुर्दे का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। 3।
ਕਹਤ ਕਬੀਰ ਹਉ ਕਹਉ ਪੁਕਾਰਿ ॥
कबीर कहता है- मैं पुकार-पुकार के कहता हूँ
ਸਮਝਿ ਦੇਖੁ ਸਾਕਤ ਗਾਵਾਰ ॥
हे ईश्वर से टूटे हुए मूर्ख ! समझ के देख।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਬਹੁਤੁ ਘਰ ਗਾਲੇ ॥
रॅब को छोड़ के औरों से प्यार डाल के बहुत सारे जीव तबाह हो गए।
ਰਾਮ ਭਗਤ ਹੈ ਸਦਾ ਸੁਖਾਲੇ ॥੪॥੪॥੧੨॥
सदा सुखी जीवन वाले सिर्फ वही हैं जो प्रभू के भक्त हैं। 4। 4। 12।
ਜਲ ਮਹਿ ਮੀਨ ਮਾਇਆ ਕੇ ਬੇਧੇ ॥
पानी में रहने वाली मछलियाँ माया में भेदी हुई हैं।
ਦੀਪਕ ਪਤੰਗ ਮਾਇਆ ਕੇ ਛੇਦੇ ॥
दीयों पर (जलने वाले) पतंगे माया में परोए हुए हैं।
ਕਾਮ ਮਾਇਆ ਕੁੰਚਰ ਕਉ ਬਿਆਪੈ ॥
काम-वासना रूपी माया हाथी को अपने वश में किए रखती है;
ਭੁਇਅੰਗਮ ਭ੍ਰਿੰਗ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਖਾਪੇ ॥੧॥
साँप और भौरे भी माया में दुखी हो रहे हैं। 1।
ਮਾਇਆ ਐਸੀ ਮੋਹਨੀ ਭਾਈ ॥
हे भाई ! माया इतनी बलवान। मोहने वाली है कि
ਜੇਤੇ ਜੀਅ ਤੇਤੇ ਡਹਕਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जितने भी जीव (जगत में) हैं। सब को डोला देती है। 1। रहाउ।
ਪੰਖੀ ਮ੍ਰਿਗ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਰਾਤੇ ॥
पंछी। जंगल के पशू सब माया में रंगे पड़े हैं।
ਸਾਕਰ ਮਾਖੀ ਅਧਿਕ ਸੰਤਾਪੇ ॥
शक्कर-रूपी माया मक्खी को बड़ा दुखी कर रही है।
ਤੁਰੇ ਉਸਟ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਭੇਲਾ ॥
घोड़े-ऊँठ सब माया में फसे हुए हैं।
ਸਿਧ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਖੇਲਾ ॥੨॥
चौरासी सिध भी माया में खेल रहे हैं। 2।
ਛਿਅ ਜਤੀ ਮਾਇਆ ਕੇ ਬੰਦਾ ॥
जती भी माया के ही गुलाम हैं।
ਨਵੈ ਨਾਥ ਸੂਰਜ ਅਰੁ ਚੰਦਾ ॥
नौ नाथ सूरज (देवता) और चंद्रमा (देवता)
ਤਪੇ ਰਖੀਸਰ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਸੂਤਾ ॥
बड़े-बड़े तपी और ऋषि सब माया में सोए पड़े हैं।
ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਕਾਲੁ ਅਰੁ ਪੰਚ ਦੂਤਾ ॥੩॥
मौत (का सहम) और पाँचों विकार भी माया में ही (जीवों को व्यापते हैं)। 3।
ਸੁਆਨ ਸਿਆਲ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਰਾਤਾ ॥
कुत्ते। गीदड़।
ਬੰਤਰ ਚੀਤੇ ਅਰੁ ਸਿੰਘਾਤਾ ॥
बंदर। चीते। शेर सब माया में रंगे हुए हैं।
ਮਾਂਜਾਰ ਗਾਡਰ ਅਰੁ ਲੂਬਰਾ ॥
बिल्ले। भेड़ें। लोमड़ी।
ਬਿਰਖ ਮੂਲ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਪਰਾ ॥੪॥
वृक्ष। कंद-मूल सब माया के अधीन हैं। 4।
ਮਾਇਆ ਅੰਤਰਿ ਭੀਨੇ ਦੇਵ ॥
देवतागण भी माया (के मोह) में भीगे हुए हैं।
ਸਾਗਰ ਇੰਦ੍ਰਾ ਅਰੁ ਧਰਤੇਵ ॥
समुंद्र। स्वर्ग। धरती इन सबके जीव भी माया में ही हैं।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਜਿਸੁ ਉਦਰੁ ਤਿਸੁ ਮਾਇਆ ॥
कबीर कहता है- (सिरे की बात यह है कि) जिसके भी पेट लगा हुआ है उसको (भाव। हरेक जीव को) माया व्याप रही है।
ਤਬ ਛੂਟੇ ਜਬ ਸਾਧੂ ਪਾਇਆ ॥੫॥੫॥੧੩॥
जब गुरू मिले तब ही जीव माया के प्रभाव से बचता है। 5। 5। 13।
ਜਬ ਲਗੁ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰੈ ॥
जब तक मनुष्य ममता के चक्कर में रहता है।
ਤਬ ਲਗੁ ਕਾਜੁ ਏਕੁ ਨਹੀ ਸਰੈ ॥
तब तक इसके (आत्मिक जीवन का) एक भी काम नहीं सँवरता।
ਜਬ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਮਿਟਿ ਜਾਇ ॥
जब इसकी ममता मिट जाती है