Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1151 (hindi)
ਭੈ ਭ੍ਰਮ ਬਿਨਸਿ ਗਏ ਖਿਨ ਮਾਹਿ ॥
एक छिन में उसके सारे डर-सहम दूर हो जाते हैं।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
हे भाई ! (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा आ बसता है 1।
ਰਾਮ ਰਾਮ ਸੰਤ ਸਦਾ ਸਹਾਇ ॥
(वह) परमात्मा अपने संत जनों का सदा मददगार है।
ਘਰਿ ਬਾਹਰਿ ਨਾਲੇ ਪਰਮੇਸਰੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਪੂਰਨ ਸਭ ਠਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! (जो) परमात्मा सब जगह पूरन तौर पर मौजूद है। घर में घर से बाहर हर जगह (संतजनों के साथ) होता है। 1। रहाउ।
ਧਨੁ ਮਾਲੁ ਜੋਬਨੁ ਜੁਗਤਿ ਗੋਪਾਲ ॥
(सेवक के लिए भी) परमात्मा का नाम ही धन है। नाम ही माल है। नाम ही जवानी है और नाम जपना ही जीने की सुचॅजी जुगति है।
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਨਿਤ ਸੁਖ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
हे भाई ! परमात्मा सेवक की जिंद की पालना करता है। सदा उसके प्राणों की रक्षा करता है। उसको सारे सुख देता है।
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਦੇ ਰਾਖੈ ਹਾਥ ॥
अपने सेवक को हाथ दे के बचाता है।
ਨਿਮਖ ਨ ਛੋਡੈ ਸਦ ਹੀ ਸਾਥ ॥੨॥
हे भाई ! परमात्मा आँख झपकने जितने समय के लिए भी अपने सेवक का साथ नहीं छोड़ता। सदा उसके साथ रहता है। 2।
ਹਰਿ ਸਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
हे भाई ! परमात्मा जैसा प्यार करने वाला और कोई नहीं है।
ਸਾਰਿ ਸਮੑਾਲੇ ਸਾਚਾ ਸੋਇ ॥
वह सदा-स्थिर प्रभू बड़े ध्यान से (अपने भक्तों की) संभाल करता है।
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਬੰਧੁ ਨਰਾਇਣੁ ॥
उनके लिए परमात्मा ही माँ है। परमात्मा ही पिता है। परमात्मा ही पुत्र है परमात्मा ही सम्बंधी है।
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਭਗਤ ਗੁਣ ਗਾਇਣੁ ॥੩॥
हे भाई ! जगत के शुरू से जुगों के आरम्भ से भगत परमात्मा के गुणों का गायन करते आ रहे हैं। 3।
ਤਿਸ ਕੀ ਧਰ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਮਨਿ ਜੋਰੁ ॥
हे भाई ! भगत जनों के मन में परमात्मा का ही आसरा है परमात्मा का ही ताण है।
ਏਕ ਬਿਨਾ ਦੂਜਾ ਨਹੀ ਹੋਰੁ ॥
उस एक के सिवा दूसरा अन्य कोई नहीं।
ਨਾਨਕ ਕੈ ਮਨਿ ਇਹੁ ਪੁਰਖਾਰਥੁ ॥
नानक के मन में (भी) यही पुरुषार्थ है कि
ਪ੍ਰਭੂ ਹਮਾਰਾ ਸਾਰੇ ਸੁਆਰਥੁ ॥੪॥੩੮॥੫੧॥
परमात्मा हमारे हरेक काम सँवारता है। 4। 38। 51।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਭੈ ਕਉ ਭਉ ਪੜਿਆ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से डर को भी डर पड़ जाता है (डर सिमरन करने वाले के नजदीक नहीं जाता)।
ਸਗਲ ਬਿਆਧਿ ਮਿਟੀ ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਕੀ ਦਾਸ ਕੇ ਹੋਏ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
माया के तीनों ही गुणों से पैदा होने वाली हरेक बिमारी (भगत-जन के अंदर से) दूर हो जाती है। प्रभू के सेवक के सारे काम सफल होते हैं। 1। रहाउ।
ਹਰਿ ਕੇ ਲੋਕ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਤਿਨ ਕਉ ਮਿਲਿਆ ਪੂਰਨ ਧਾਮ ॥
हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनको सर्व-व्यापक प्रभू के चरणों में ठिकाना मिला रहता है।
ਜਨ ਕਾ ਦਰਸੁ ਬਾਂਛੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਹੋਇ ਪੁਨੀਤ ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਾਮ ॥੧॥
हे भाई ! धर्मराज जम राज भी दिन-रात परमात्मा के भगत का दर्शन करने की अभिलाषा रखता है (क्योंकि उस दर्शन से वह) पवित्र हो सकता है। 1।
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਮਦ ਨਿੰਦਾ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟਿਆ ਅਭਿਮਾਨ ॥
हे भाई ! गुरमुखों की संगति में रहने से काम क्रोध लोभ मोह अहंकार (हरेक विकार मनुष्य के अंदर से) खत्म हो जाता है।
ਐਸੇ ਸੰਤ ਭੇਟਹਿ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕੈ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨ ॥੨॥੩੯॥੫੨॥
पर ऐसे संत जन बड़े भाग्यों से ही मिलते हैं। हे नानक ! (कह-) मैं उन संतजनों से सदा सदके जाता हूँ। 2। 39। 52।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਪੰਚ ਮਜਮੀ ਜੋ ਪੰਚਨ ਰਾਖੈ ॥
वह मनुष्य (दरअसल कामादिक) पाँच पीरों का उपासक होता है क्योंकि वह इन पाँचों को (अपने हृदय में) संभाल के रखता है।
ਮਿਥਿਆ ਰਸਨਾ ਨਿਤ ਉਠਿ ਭਾਖੈ ॥
और सदा गिन-मिथ के अपनी जीभ से झूठ बोलता रहता है। 1।
ਚਕ੍ਰ ਬਣਾਇ ਕਰੈ ਪਾਖੰਡ ॥
हे भाई ! (नाम सिमरन को छोड़ के जो मनुष्य शरीर पर) गणेश आदि का निशान बना के अपने धर्मी होने का दिखावा करता है।
ਝੁਰਿ ਝੁਰਿ ਪਚੈ ਜੈਸੇ ਤ੍ਰਿਅ ਰੰਡ ॥੧॥
वह (असल में) अंदर-अंदर से माया की खातिर तरले ले-ले के जलता रहता है। जैसे विधवा स्त्री (पति के बिना सदा दुखी रहती है)।
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਸਭ ਝੂਠੁ ॥
हे भाई ! परमात्मा के नाम सिमरन के बिना (और) सारी (दिखावे वाली धार्मिक क्रिया) झूठा उद्यम है।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਸਾਚੀ ਦਰਗਹਿ ਸਾਕਤ ਮੂਠੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
पूरे गुरू की शरण पड़े बिना विकारों से निजात नहीं मिलती। सदा कायम रहने वाले परमात्मा से टूटे हुए मनुष्यों का ठॅगी-ठोरी का पाज़ चल नहीं सकता। 1। रहाउ।
ਸੋਈ ਕੁਚੀਲੁ ਕੁਦਰਤਿ ਨਹੀ ਜਾਨੈ ॥
हे भाई ! असल में वही मनुष्य कुचील रहन-सहन वाला है जो इस सारी रचना में (इसके कारतार सृजनहार को बसता) नहीं पहचान सकता।
ਲੀਪਿਐ ਥਾਇ ਨ ਸੁਚਿ ਹਰਿ ਮਾਨੈ ॥
अगर बाहर से चौका लीपा-पोता जाए। (तो उस बाहरी स्वच्छता को) परमात्मा स्वच्छ नहीं समझता।
ਅੰਤਰੁ ਮੈਲਾ ਬਾਹਰੁ ਨਿਤ ਧੋਵੈ ॥
जिस मनुष्य का हृदय तो विकारों से गंदा होया हुआ है। पर वह अपने शरीर को (स्वच्छता। सुचि की खातिर) सदा धोता रहता है।
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹਿ ਅਪਨੀ ਪਤਿ ਖੋਵੈ ॥੨॥
वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में अपनी इज्जत गवा लेता है। 2।
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਕਰੈ ਉਪਾਉ ॥
हे भाई ! (अपने धर्मी होने का दिखावा करने वाले मनुष्य अंदर से) माया इकट्ठी करने की खातिर (भेष और स्वच्छता आदि का) प्रयास करता है (आडंबर करता है)।
ਕਬਹਿ ਨ ਘਾਲੈ ਸੀਧਾ ਪਾਉ ॥
पर (पवित्र जीवन वाले रास्ते पर) कभी भी सीधा पैर नहीं रखता।
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਸੁ ਚੀਤਿ ਨ ਆਣੈ ॥
जिस परमात्मा ने पैदा किया है। उसको अपने चिक्त में नहीं बसाता।
ਕੂੜੀ ਕੂੜੀ ਮੁਖਹੁ ਵਖਾਣੈ ॥੩॥
(हाँ) झूठ-मूठ (लोगों को ठगने के लिए अपने) मुँह से (राम-राम) उचारता रहता है। 3।
ਜਿਸ ਨੋ ਕਰਮੁ ਕਰੇ ਕਰਤਾਰੁ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य पर करतार-सृजनहार मेहर करता है।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੋਇ ਤਿਸੁ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
साध-संगति में उस मनुष्य का उठना-बैठना हो जाता है।
ਹਰਿ ਨਾਮ ਭਗਤਿ ਸਿਉ ਲਾਗਾ ਰੰਗੁ ॥
परमात्मा के नाम से परमात्मा की भक्ति से उसका प्रेम बन जाता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਨਹੀ ਭੰਗੁ ॥੪॥੪੦॥੫੩॥
हे नानक ! उस मनुष्य को (आत्मिक आनंद में कभी) कमी नहीं आती। 4। 40। 53।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਨਿੰਦਕ ਕਉ ਫਿਟਕੇ ਸੰਸਾਰੁ ॥
हे भाई ! संत जनों पर दूषण लगाने वाले मनुष्य को सारा जगत घिक्कारता है
ਨਿੰਦਕ ਕਾ ਝੂਠਾ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
(क्योंकि जगत जानता है कि) तोहमतें लगाने वाले का ये व्यवहार (कसब) झूठा है।
ਨਿੰਦਕ ਕਾ ਮੈਲਾ ਆਚਾਰੁ ॥
हे भाई ! (दूषण लगा-लगा के) दूषण लग्राने वाला का अपना आचरण ही गंदा हो जाता है।
ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ॥੧॥
पर परमात्मा अपने सेवक को (विकारों में गिरने से) स्वयं बचाए रखता है। 1।
ਨਿੰਦਕੁ ਮੁਆ ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਨਾਲਿ ॥
हे भाई ! (संतजनों पर) दूषण लगाने वाला मनुष्य तोहमत लगाने वाले की सोहबत (संगति) में रह के आत्मिक मौत सहेड़ लेता है।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸਰਿ ਜਨ ਰਾਖੇ ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਸਿਰਿ ਕੜਕਿਓ ਕਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
प्रभू-परमेश्वर ने (विकारों में गिरने से सदा ही अपने) सेवकों की रक्षा की है। पर उन पर तोहमतें लगाने वालों के सिर पर आत्मिक मौत (सदा) गरजती रहती है। 1। रहाउ।