Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1147 (hindi)
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੪॥੨੫॥੩੮॥
हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मेहर कर के (जिसको तू अपना नाम बख्शता है। वह मनुष्य) आत्मिक आनंद पाता है। 4। 25। 38।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਰਹਾ ਕਲਿ ਮਾਹਿ ॥
हे प्रभू ! इस विकार भरे जगत में मैं तेरे आसरे ही जीवित हूँ।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਗਾਹਿ ॥
हे प्रभू ! (सब जीव) तेरे ही सहारे हैं। तेरे ही गुण गाते हैं।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਨ ਪੋਹੈ ਕਾਲੁ ॥
हे प्रभू !जिस मनुष्य को तेरा आसरा है उस पर आत्मिक मौत अपना प्रभाव नहीं डाल सकती।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਬਿਨਸੈ ਜੰਜਾਲੁ ॥੧॥
तेरे आसरे (मनुष्य की) माया के मोह का फंदा टूट जाता है। 1।
ਦੀਨ ਦੁਨੀਆ ਤੇਰੀ ਟੇਕ ॥
हे प्रभू ! इस लोक में और परलोक में (हम जीवों को) तेरा ही सहारा है।
ਸਭ ਮਹਿ ਰਵਿਆ ਸਾਹਿਬੁ ਏਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! सारी सृष्टि में मालिक प्रभू ही व्यापक है। 1। रहाउ।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਕਰਉ ਆਨੰਦ ॥
हे प्रभू ! मैं तेरे नाम का आसरा ले के ही आत्मिक आनंद पाता हूँ और
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਜਪਉ ਗੁਰ ਮੰਤ ॥
गुरू का दिया हुआ तेरा नाम-मंत्र जपता रहता हूँ।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਤਰੀਐ ਭਉ ਸਾਗਰੁ ॥
हे प्रभू !तेरे (नाम के) सहारे संसार-समुंद्र से पार लांघ जाया जाता है।
ਰਾਖਣਹਾਰੁ ਪੂਰਾ ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ॥੨॥
तू सबकी रक्षा करने के समर्थ है। तू सारे सुखों का (मानो) समुंद्र है। 2।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਨਾਹੀ ਭਉ ਕੋਇ ॥
हे प्रभू ! जिस को तेरे नाम का आसरा है उसको कोई डर व्याप नहीं सकता।
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਾਚਾ ਸੋਇ ॥
हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला प्रभू ही सब के दिल की जानने वाला है।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਤੇਰਾ ਮਨਿ ਤਾਣੁ ॥
हे प्रभू ! सब जीवों को तेरा ही आसरा है। सबके मन में तेरे नाम का ही सहारा है।
ਈਹਾਂ ਊਹਾਂ ਤੂ ਦੀਬਾਣੁ ॥੩॥
इस लोक में और परलोक में तू ही जीवों का आसरा है। 3।
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਤੇਰਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥
हे गुणों के खजाने प्रभू ! (हम जीवों को) तेरी ही टेक है तेरा ही आसरा है।
ਸਗਲ ਧਿਆਵਹਿ ਪ੍ਰਭ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥
सब जीव तेरा ही ध्यान धरते हैं।
ਜਪਿ ਜਪਿ ਅਨਦੁ ਕਰਹਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸਾ ॥
तेरे दास तेरा नाम जप-जप के आत्मिक आनंद पाते हैं।
ਸਿਮਰਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੪॥੨੬॥੩੯॥
हे नानक ! (तू भी) सदा कायम रहने वाले और गुणों के खजाने प्रभू का नाम सिमरा कर। 4। 26। 39।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਪ੍ਰਥਮੇ ਛੋਡੀ ਪਰਾਈ ਨਿੰਦਾ ॥
(वह मनुष्य बाहर की स्वच्छता की जगह अंदर की पवित्रता कायम रख सकने के लिए) सबसे पहले दूसरों के ऐब ढूँढने छोड़ देता है
ਉਤਰਿ ਗਈ ਸਭ ਮਨ ਕੀ ਚਿੰਦਾ ॥
(इस तरह उसके अपने) मन की सारी चिंता उतर जाती है (मन से विकारों का चिंतन उतर जाता है)।
ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਕੀਨੋ ਦੂਰਿ ॥
वह मनुष्य (अपने अंदर से) लोभ और मोह सारे का सारा दूर कर देता है।
ਪਰਮ ਬੈਸਨੋ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖਿ ਹਜੂਰਿ ॥੧॥
हे भाई ! परमात्मा को अंग-संग बसता देख के (मनुष्य) सबसे ऊँचा वैश्णव बन जाता है। 1।
ਐਸੋ ਤਿਆਗੀ ਵਿਰਲਾ ਕੋਇ ॥
हे भाई ! (इस तरह का वैश्णव ही असल त्यागी है। पर) ऐसा त्यागी (जगत में) कोई विरला मनुष्य ही होता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਜਨੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वही मनुष्य (सही अर्थों में) परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ।
ਅਹੰਬੁਧਿ ਕਾ ਛੋਡਿਆ ਸੰਗੁ ॥
हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा हाज़र-नाज़र देख के असल वैश्णव बन जाता है। वह) अहंकार का साथ छोड़ देता है।
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਕਾ ਉਤਰਿਆ ਰੰਗੁ ॥
(उसके मन से) काम और क्रोध का असर दूर हो जाता है।
ਨਾਮ ਧਿਆਏ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰੇ ॥
वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता है।
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਿਸਤਰੇ ॥੨॥
हे भाई ! ऐसे मनुष्य साध-संगति में रह के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 2।
ਬੈਰੀ ਮੀਤ ਹੋਏ ਸੰਮਾਨ ॥
इस वास्ते उसको वैरी और मित्र एक समान (मित्र ही) दिखाई देते हैं।
ਸਰਬ ਮਹਿ ਪੂਰਨ ਭਗਵਾਨ ॥
उसको भगवान सब जीवों में व्यापक दिखाई देता है।
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਆਗਿਆ ਮਾਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
उसने परमात्मा की रजा को मीठा जान के सदा आत्मिक आनंद पाया है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥੩॥
हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम पक्के तौर पर टिका दिया। 3।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਰਾਖੈ ਆਪਿ ॥
हे भाई ! परमात्मा अपनी मेहर करके जिस मनुष्य की स्वयं रक्षा करता है।
ਸੋਈ ਭਗਤੁ ਜਪੈ ਨਾਮ ਜਾਪ ॥
वही है असल भगत। वही उस के नाम का जाप जपता है।
ਮਨਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਮਤਿ ਲਈ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू से (जीवन-जुगति की) शिक्षा ले ली उसके मन में (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो गया।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਪੂਰੀ ਪਈ ॥੪॥੨੭॥੪੦॥
हे नानक ! कह- उस मनुष्य का जीवन सफल हो गया। 4। 27। 40।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਸੁਖੁ ਨਾਹੀ ਬਹੁਤੈ ਧਨਿ ਖਾਟੇ ॥
हे भाई ! बहुत धन कमाने से (आत्मिक) आनंद नहीं मिलता।
ਸੁਖੁ ਨਾਹੀ ਪੇਖੇ ਨਿਰਤਿ ਨਾਟੇ ॥
नाटकों के नाच देखने से भी आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता।
ਸੁਖੁ ਨਾਹੀ ਬਹੁ ਦੇਸ ਕਮਾਏ ॥
हे भाई ! बहुत सारे देशों को जीत लेने से भी सुख नहीं मिलता। पर।
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੧॥
हे भाई ! परमात्मा की सिफतसालाह करने से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1।
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਲਹਹੁ ॥
हे भाई ! आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद पाओ।
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕਹਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
(साध-संगति में) गुरू की शरण पड़ कर सदा परमात्मा का नाम जपो। (और। हे भाई ! बड़ी किस्मत से ही साध-संगति मिलती है। 1। रहाउ।
ਬੰਧਨ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ॥
हे भाई ! माता। पिता। पुत्र। स्त्री (आदि सम्बंधी) माया के मोह के फंदे डालते हैं।
ਬੰਧਨ ਕਰਮ ਧਰਮ ਹਉ ਕਰਤਾ ॥
(तीर्थ आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्म भी फंदे पैदा करते हैं (क्योंकि इनके कारण मनुष्य) अहंकार करता है (कि मैंने तीर्थ यात्रा आदि कर्म किए हैं)।
ਬੰਧਨ ਕਾਟਨਹਾਰੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ॥
पर जब ये फंदे काट सकने वाला परमात्मा (मनुष्य के) मन में आ बसता है तब (माता-पिता-पुत्र-स्त्री आदि सम्बंधियों में रहते हुए ही)
ਤਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਨਿਜ ਘਰਿ ਬਸੈ ॥੨॥
आत्मिक आनंद पाता है (क्योंकि तब मनुष्य) परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 2।
ਸਭਿ ਜਾਚਿਕ ਪ੍ਰਭ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
हे भाई ! सारे जीव सब कुछ दे सकने वाले प्रभू (के दर) के (ही) मंगते हैं।
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਬੇਅੰਤ ਅਪਾਰ ॥
वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है। बेअंत है। उसकी हस्ती का परला छोर नहीं पाया जा सकता।
ਜਿਸ ਨੋ ਕਰਮੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्यारा प्रभू बख्शिश करता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤਿਨੈ ਜਨਿ ਜਪਨਾ ॥੩॥
उसी ही मनुष्य ने सदा परमात्मा का नाम जपा है। 3।
ਗੁਰ ਅਪਨੇ ਆਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥
अपने गुरू के दर पे (सदा) अरजोई किया कर। और।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪੁਰਖ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥
हे सृष्टि के मालिक ! हे गुणों के खजाने अकाल पुरख !
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
नानक कहता - मैं तेरी शरण आया हूँ।
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਖਹੁ ਗੁਸਾਈ ॥੪॥੨੮॥੪੧॥
मेहर कर के जैसे तेरी रज़ा है वैसे मुझे (अपने चरणों में) रख। 4। 28। 41।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਤਿਆਗਿਓ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के (अपने अंदर से) माया का मोह छोड़ दिया।