Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1141 (hindi)
ਰੋਗ ਬੰਧ ਰਹਨੁ ਰਤੀ ਨ ਪਾਵੈ ॥
रोग के बँधनों के कारण (जूनियों में) भटकने से रक्ती भर भी खलासी नहीं मिल सकती।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਰੋਗੁ ਕਤਹਿ ਨ ਜਾਵੈ ॥੩॥
हे भाई ! गुरू की शरण के बिना (यह) रोग किसी तरह भी दूर नहीं होता। 3।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਜਿਸੁ ਕੀਨੀ ਦਇਆ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा ने मेहर कर दी।
ਬਾਹ ਪਕੜਿ ਰੋਗਹੁ ਕਢਿ ਲਇਆ ॥
उसको उसने बाँह पकड़ के रोगों से बचा लिया।
ਤੂਟੇ ਬੰਧਨ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਆ ॥
जब उसने गुरू की संगति प्राप्त की। उसके (आत्मिक रोगों के सारे) बँधन टूट गए।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਰੋਗੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥੪॥੭॥੨੦॥
हे नानक ! कह- (जो भी मनुष्य गुरू की शरण पड़ा। ) गुरू ने (उसका) रोग मिटा दिया। 4। 7। 20।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਮਹਾ ਅਨੰਦ ॥
हे भाई ! (जब किसी मनुष्य के) हृदय में परमात्मा आ बसता है। तब उसके अंदर बड़ा आनंद बन जाता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਭਿ ਦੁਖ ਭੰਜ ॥
तब उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਰਧਾ ਪੂਰੀ ॥
तब उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਕਬਹਿ ਨ ਝੂਰੀ ॥੧॥
तब वह कभी भी कोई चिंता-फिक्र नहीं करता। 1।
ਅੰਤਰਿ ਰਾਮ ਰਾਇ ਪ੍ਰਗਟੇ ਆਇ ॥
हे भाई ! पूरे गुरू से जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू-पातशाह प्रकट हो जाता है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੀਓ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
उसके अंदर रंग लगा देता है (आत्मिक आनंद बना देता है)। 1। रहाउ।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਰਬ ਕੋ ਰਾਜਾ ॥
हे भाई ! (जब किसी मनुष्य के) हृदय में परमात्मा आ बसता है। तब वह (मानो) सबका राजा बन जाता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਪੂਰੇ ਕਾਜਾ ॥
तब उसके सारे काम सफल हो जाते हैं।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਰੰਗਿ ਗੁਲਾਲ ॥
तब वह गाढ़े आत्मिक आनंद में मस्त रहता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥
तब वह सदा प्रसन्न-चिक्त रहता है। 2।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਦ ਧਨਵੰਤਾ ॥
हे भाई ! (जब परमात्मा किसी मनुष्य के) हृदय में आ बसता है। त बवह सदा के लिए नाम-धन का शाह बन जाता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਦ ਨਿਭਰੰਤਾ ॥
तब वह सदा के लिए माया की खातिर भटकना से बच जाता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਭਿ ਰੰਗ ਮਾਣੇ ॥
त बवह सारे (आत्मिक) आनंद भोगता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਚੂਕੀ ਕਾਣੇ ॥੩॥
तब उसे किसी की मुथाजी नहीं रह जाती। 3।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸਹਜ ਘਰੁ ਪਾਇਆ ॥
हे भाई ! (जब परमात्मा किसी मनुष्य के) हृदय में आ प्रकट होता है। तब वह मनुष्य आत्मिक अडोलता का ठिकाना पा लेता है।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਸੁੰਨਿ ਸਮਾਇਆ ॥
तब वह उस आत्मिक अवस्था में लीन रहता है जहाँ माया वाले फुरने नहीं उठते।
ਚੀਤਿ ਆਵੈ ਸਦ ਕੀਰਤਨੁ ਕਰਤਾ ॥
तबवह सदा परमात्मा की सिफत-सालाह करता है।
ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਨਾਨਕ ਭਗਵੰਤਾ ॥੪॥੮॥੨੧॥
हे नानक ! तब उसका मन परमात्मा के साथ पतीज जाता है। 4। 8। 21।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਬਾਪੁ ਹਮਾਰਾ ਸਦ ਚਰੰਜੀਵੀ ॥
हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। तब मुझे निश्चय हो गया कि) हम जीवों का प्रभू-पिता सदा कायम रहने वाला है।
ਭਾਈ ਹਮਾਰੇ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵੀ ॥
मेरे साथ आत्मिक सांझ रखने वाले भी सदा ही आत्मिक जीवन वाले बन गए।
ਮੀਤ ਹਮਾਰੇ ਸਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
मेरे साथ हरी-नाम सिमरन का प्रेम रखने वाले सदा के लिए अटल जीवन वाले हो गए।
ਕੁਟੰਬੁ ਹਮਾਰਾ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸੀ ॥੧॥
(सारी इन्द्रियों का) मेरा परिवार प्रभू-चरणों में टिके रहने वाला बन गया। 1।
ਹਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤਾਂ ਸਭਹਿ ਸੁਹੇਲੇ ॥
हे भाई ! जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪਿਤਾ ਸੰਗਿ ਮੇਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तब (मेरे साथ संबंध रखने वाले मित्र। भाई सारे इन्द्रियां- यह) सारे ही (आत्मिक आनंद की बरकति से) सुखी हो गए। 1। रहाउ।
ਮੰਦਰ ਮੇਰੇ ਸਭ ਤੇ ਊਚੇ ॥
हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। तब मेरी जिंद के टिके रहने वाले) ठिकाने सारी (मायावी प्रेरणाओं) से ऊँचे हो गए कि
ਦੇਸ ਮੇਰੇ ਬੇਅੰਤ ਅਪੂਛੇ ॥
यम-राज वहाँ कुछ पूछने के लायक ही ना रहा।
ਰਾਜੁ ਹਮਾਰਾ ਸਦ ਹੀ ਨਿਹਚਲੁ ॥
तब मेरी अपनी इन्द्रियों पर हकूमत सदा के लिए अॅटल हो गई।
ਮਾਲੁ ਹਮਾਰਾ ਅਖੂਟੁ ਅਬੇਚਲੁ ॥੨॥
तब मेरे पास इतना नाम-खजाना इकट्ठा हो गया। जो खत्म ही ना हो सके। जो सदा के लिए कायम रहे। 2।
ਸੋਭਾ ਮੇਰੀ ਸਭ ਜੁਗ ਅੰਤਰਿ ॥
हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया। मुझे समझ आ गई कि यह जो प्रभू की शोभा) सारे युगों में हो रही है मेरे वास्ते भी यही शोभा है
ਬਾਜ ਹਮਾਰੀ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ॥
मेरे लिए भी यही है। (यह जो) सब लोगों में (प्रभू की) भक्ति हो रही है मेरे लिए भी यही है (प्रभू-चरणों में मिलाप की बरकति से मुझे किसी शोभा मशहूरी कीर्ति आदर-मान की वासना नहीं रही)
ਕੀਰਤਿ ਹਮਰੀ ਘਰਿ ਘਰਿ ਹੋਈ ॥
(यह जो) हरेक जगह में (प्रभू की) कीर्ति हो रही है।
ਭਗਤਿ ਹਮਾਰੀ ਸਭਨੀ ਲੋਈ ॥੩॥
(यह जो) हरेक घर में (प्रभू की) सिफत-सालाह हो रही है। । 3।
ਪਿਤਾ ਹਮਾਰੇ ਪ੍ਰਗਟੇ ਮਾਝ ॥
हे भाई ! (जब पूरे गुरू ने मुझे प्रभू-पिता के साथ मिला दिया) प्रभू-पिता मेरे हृदय में प्रकट हो गए।
ਪਿਤਾ ਪੂਤ ਰਲਿ ਕੀਨੀ ਸਾਂਝ ॥
प्रभू-पिता ने मेरे साथ इस तरह प्यार डाल लिया जैसे पिता अपने पुत्र के साथ प्यार बनाता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਉ ਪਿਤਾ ਪਤੀਨੇ ॥
हे नानक ! कह-जब पिता-प्रभू (अपने किसी पुत्र पर) दयावान होता है।
ਪਿਤਾ ਪੂਤ ਏਕੈ ਰੰਗਿ ਲੀਨੇ ॥੪॥੯॥੨੨॥
तब प्रभू-पिता और जीव-पुत्र एक ही प्यार में एक-मेक हो जाते हैं। 4। 9। 22।
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५॥
ਨਿਰਵੈਰ ਪੁਰਖ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ॥
हे किसी से वैर ना रखने वाले गुरू पुरख ! हे दातार प्रभू !
ਹਮ ਅਪਰਾਧੀ ਤੁਮੑ ਬਖਸਾਤੇ ॥
हम (जीव) भूल (-चूक) करने वाले हैं। तुम (हमारी) भूलें बख्शने वाले हो।
ਜਿਸੁ ਪਾਪੀ ਕਉ ਮਿਲੈ ਨ ਢੋਈ ॥
हे सतिगुरू ! जिस पापी को और कहीं आसरा नहीं मिलता।
ਸਰਣਿ ਆਵੈ ਤਾਂ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਈ ॥੧॥
जब वह तेरी शरण आ जाता है। तब वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है। 1।
ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਨਾਇ ॥
हे भाई ! गुरू को हृदय में बसा के (मनुष्य) सारे (इच्छित) फल हासिल कर लेता है।
ਸਭ ਫਲ ਪਾਏ ਗੁਰੂ ਧਿਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरू को प्रसन्न करके (मनुष्य) आत्मिक आनंद प्राप्त कर लेता है। 1। रहाउ।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸਤਿਗੁਰ ਆਦੇਸੁ ॥
हे गुरू ! हे प्रभू ! (तुझे मेरी) नमस्कार है।
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ਦੇਸੁ ॥
(हम जीवों का यह) मन (यह) तन तेरा ही दिया हुआ है (जो कुछ दिखाई दे रहा है) सारा तेरा ही देश है (हर जगह तू ही बस रहा है)।
ਚੂਕਾ ਪੜਦਾ ਤਾਂ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ॥
(जब किसी जीव के अंदर से माया के मोह का) पर्दा गिर जाता है तब तू उसको दिखाई दे जाता है।
ਖਸਮੁ ਤੂਹੈ ਸਭਨਾ ਕੇ ਰਾਇਆ ॥੨॥
हे सब जीवों के पातशाह ! तू (सबका) पति है। 2।
ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਸੂਕੇ ਕਾਸਟ ਹਰਿਆ ॥
हे भाई ! यदि उस प्रभू को ठीक लगे तो सूखे काष्ठ हरे हो जाते हैं।
ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਾਂ ਥਲ ਸਿਰਿ ਸਰਿਆ ॥
थल पर सरोवर बन जाता है।
ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਾਂ ਸਭਿ ਫਲ ਪਾਏ ॥
जब कोई मनुष्य उस प्रभू को अच्छा लग जाए। तब वह सारे फल प्राप्त कर लेता है।
ਚਿੰਤ ਗਈ ਲਗਿ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਏ ॥੩॥
गुरू के चरणों में लग के (उसके अंदर से) चिंता दूर हो जाता है। 3।