Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1112 (hindi)
ਅਨਦਿਨੁ ਰਤੜੀਏ ਸਹਜਿ ਮਿਲੀਜੈ ॥
हे हर वक्त प्रेम-रंग में रंगे हुए ! आत्मिक अडोलता में टिके रहना चाहिए (भाव। हे भाई ! जो जीव-स्त्री हर वक्त परमात्मा के प्यार रंग में रंगी रहती है। जो प्रभू की याद में कभी ढील नहीं करती। जो हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। उस जीव-स्त्री को परमात्मा अपने चरणों से जोड़ता है)।
ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਮਿਲੀਜੈ ਰੋਸੁ ਨ ਕੀਜੈ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰਿ ਸਮਾਣੀ ॥
हे भाई ! आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में टिके रहना चाहिए। (किसी अपने उद्यम पर गर्व करके इस बात का) शिकवा नहीं करना चाहिए (कि मेरा उद्यम जल्दी सफल क्यों नहीं होता। जो भी जीव-स्त्री प्रभू का मिलाप हासिल करती है) अहंकार दूर करके (ही प्रभू में) लीन होती है।
ਸਾਚੈ ਰਾਤੀ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਈ ਮਨਮੁਖਿ ਆਵਣ ਜਾਣੀ ॥
जिसको गुरू मिलाता है वही मिलती है। वह सदा कायम रहने वाले प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। अपने मन के पीछे चलने वाली जनम-मरण के चक्करों में पड़ी रहती है।
ਜਬ ਨਾਚੀ ਤਬ ਘੂਘਟੁ ਕੈਸਾ ਮਟੁਕੀ ਫੋੜਿ ਨਿਰਾਰੀ ॥
हे भाई ! (जैसे) जब कोई स्त्री नाचने लग जाए तो वह घूँघट नहीं करती। (वैसे ही जो जीव-स्त्री प्रभू-प्यार की राह पर चलती है वह) शरीर का मोह छोड़ के (माया से) निर्लिप हो जाती है।
ਨਾਨਕ ਆਪੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੀ ॥੪॥੪॥
हे नानक ! गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य सदा अपने जीवन को पड़तालता रहता है। उस असल जीवन राह को अपने विचार-मण्डल में टिकाए रखता है। 4। 4।
ਤੁਖਾਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
तुखारी महला १॥
ਮੇਰੇ ਲਾਲ ਰੰਗੀਲੇ ਹਮ ਲਾਲਨ ਕੇ ਲਾਲੇ ॥
हे भाई ! मनमोहक प्रभू जी अनेकों करिश्मे करने वाले हैं। मैं उस सुंदर प्रभू का (सदा के लिए) गुलाम हूँ।
ਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਭਾਲੇ ॥
हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू ने अलख प्रभू की सूझ बख्श दी। (वह मनुष्य उसको छोड़ के) किसी और की तलाश नहीं करता।
ਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਇਆ ਜਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
हे भाई ! जब प्रभू की रज़ा हुई। जब प्रभू ने (किसी जीव पर) कृपा की। तब गुरू ने उसको अलख प्रभू का ज्ञान दिया।
ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ਸਹਜਿ ਮਿਲੇ ਬਨਵਾਰੀ ॥
तब उसको आत्मिक अडोलता में टिक के वह परमात्मा मिल जाता है जो जगत का सहारा है जो सब दातें देने वाला है जो सर्व-व्यापक है और सृजनहार है।
ਨਦਰਿ ਕਰਹਿ ਤੂ ਤਾਰਹਿ ਤਰੀਐ ਸਚੁ ਦੇਵਹੁ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! जब तू अपना सदा-स्थिर नाम देता है। जब तू मेहर की निगाह करता है। जब तू (स्वयं संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। तब ही पार लांघ सकते हैं।
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਤੂ ਸਰਬ ਜੀਆ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੧॥
तेरे दासों का दास विनती करता है कि तू सारे जीवों की रक्षा करने वाला है। 1।
ਭਰਿਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹੇ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥
हे भाई ! गुरू के शबद से (ये समझ आ जाती है कि सब जीवों को) बहुत ही प्यार करने वाला परमात्मा सब में व्यापक है। (सारी सृष्टि को) आसरा दे रहा है। बड़ी हस्ती वाला है और सब जीवों में मौजूद है।
ਸਬਦੇ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਗੁਰ ਰੂਪਿ ਮੁਰਾਰੇ ॥
गुरु रूप ईश्वर शब्द में ही रमण कर रहा है।
ਗੁਰ ਰੂਪ ਮੁਰਾਰੇ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਾਰੇ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
हे भाई ! सबसे बड़ी हस्ती वाला परमात्मा तीन भवनों को सहारा दे रहा है। (किसी भी जीव ने अभी तक) उस (के गुणों) का अंत नहीं पाया।
ਰੰਗੀ ਜਿਨਸੀ ਜੰਤ ਉਪਾਏ ਨਿਤ ਦੇਵੈ ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ॥
वह परमात्मा अनेकों रंगों के अनेकों किस्मों के जीव पैदा करता है। (सब जीवों को) सदा (दान) देता है। और उसका भण्डारा हमेशा बढ़ता ही रहता है।
ਅਪਰੰਪਰੁ ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਹੋਵੈ ॥
हे भाई ! परमात्मा बहुत बेअंत है। वह स्वयं ही पैदा करके स्वयं ही नाश करता है। (जगत में) वही कुछ होता है जो उसको अच्छा लगता है।
ਨਾਨਕ ਹੀਰਾ ਹੀਰੈ ਬੇਧਿਆ ਗੁਣ ਕੈ ਹਾਰਿ ਪਰੋਵੈ ॥੨॥
हे नानक ! (कह- हे भाई ! जो जीव उस परमात्मा के) गुणों के हार में (अपने आप को) परो लेता है वह पवित्र हो चुकी जीवात्मा महान ऊँचे परमात्मा में एक-रूप हो जाती है। 2।
ਗੁਣ ਗੁਣਹਿ ਸਮਾਣੇ ਮਸਤਕਿ ਨਾਮ ਨੀਸਾਣੋ ॥
हे भाई ! जिनके माथे पर परमात्मा की प्राप्ति का लेख लिखा होता है। वह मनुष्य परमात्मा के गुण उचार के उन गुणों में लीन हुए रहते हैं।
ਸਚੁ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇਆ ਚੂਕਾ ਆਵਣ ਜਾਣੋ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम उचार के सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हुआ रहता है। उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है।
ਸਚੁ ਸਾਚਿ ਪਛਾਤਾ ਸਾਚੈ ਰਾਤਾ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥
हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहने वाला मनुष्य सदा कायम प्रभू के साथ गहरी सांझ बनाए रखता है। सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। उसको सदा-स्थिर प्रभू का मिलाप प्राप्त हो जाता है। उसके मन में वह प्यारा लगता रहता है।
ਸਾਚੇ ਊਪਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਦੀਸੈ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
उस मनुष्य को सदा-स्थिर परमात्मा से बड़ा और कोई नहीं दिखता। वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो रहा होता है।
ਮੋਹਨਿ ਮੋਹਿ ਲੀਆ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਬੰਧਨ ਖੋਲਿ ਨਿਰਾਰੇ ॥
हे भाई ! उस मोहन (प्रभू) ने मेरा मन (भी) मोह लिया है। प्रभू उसके (माया के मोह के) बँधन काट के उसको (माया से) निर्लिप कर देता है
ਨਾਨਕ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਣੀ ਜਾ ਮਿਲਿਆ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥੩॥
हे नानक ! कह- हे भाई ! जब (कोई बहुत भाग्यशाली मनुष्य उस) अति-प्यारे-परमात्मा को मिल लेता है। उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है। । 3।
ਸਚ ਘਰੁ ਖੋਜਿ ਲਹੇ ਸਾਚਾ ਗੁਰ ਥਾਨੋ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य को सदा-स्थिर साध-संगति प्राप्त हो जाती है। वह मनुष्य (साध-संगति में) खोज करके सदा कायम रहने वाले परमात्मा का ठिकाना पा लेता है।
ਮਨਮੁਖਿ ਨਹ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੋ ॥
हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा के साथ गहरी सांझ प्राप्त होती है। अपने मन के पीछे चलने वाले को (यह दाति) नहीं मिलती।
ਦੇਵੈ ਸਚੁ ਦਾਨੋ ਸੋ ਪਰਵਾਨੋ ਸਦ ਦਾਤਾ ਵਡ ਦਾਣਾ ॥
हे भाई ! (गुरू जिस मनुष्य को) सदा दातें देने वाले बड़े समझदार सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम-दान देता है।
ਅਮਰੁ ਅਜੋਨੀ ਅਸਥਿਰੁ ਜਾਪੈ ਸਾਚਾ ਮਹਲੁ ਚਿਰਾਣਾ ॥
वह मनुष्य उस अमर अजोनी और सदा स्थिर प्रभू (का नाम सदा) जपता रहता है। उस मनुष्य को परमात्मा का आदि का सदा-स्थिर ठिकाना मिल जाता है।
ਦੋਤਿ ਉਚਾਪਤਿ ਲੇਖੁ ਨ ਲਿਖੀਐ ਪ੍ਰਗਟੀ ਜੋਤਿ ਮੁਰਾਰੀ ॥
हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर) परमात्मा की ज्योति प्रकट हो जाती है। उस ज्योति की बरकति से उस मनुष्य का विकारों के कर्ज़े का हिसाब लिखना बंद हो जाता है (भाव। वह मनुष्य विकारों से हट जाता है)।
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਸਾਚੈ ਰਾਚਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੀਐ ਤਾਰੀ ॥੪॥੫॥
वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है वह मनुष्य हर वक्त सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से ही (माया के मोह के समुंद्र में से) ये तैराकी की जा सकती है। 4। 5।
ਤੁਖਾਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
तुखारी महला १॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਤੂ ਸਮਝੁ ਅਚੇਤ ਇਆਣਿਆ ਰਾਮ ॥
हे मेरे मन ! हे मेरे गाफिल मन ! हे मेरे अंजान मन ! तू होश कर।
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਛਡਿ ਅਵਗਣ ਗੁਣੀ ਸਮਾਣਿਆ ਰਾਮ ॥
हे मेरे मन ! बुरे कर्म करने छोड़ दे। (परमात्मा के) गुणों (की याद) में लीन रहा कर।
ਬਹੁ ਸਾਦ ਲੁਭਾਣੇ ਕਿਰਤ ਕਮਾਣੇ ਵਿਛੁੜਿਆ ਨਹੀ ਮੇਲਾ ॥
हे मेरे मन ! जो मनुष्य अनेकों (पदार्थों के) स्वादों में फसे रहते हैं। वे अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (परमात्मा से विछुड़े रहते हैं। इन संस्कारों के कारण ही) उन विछुड़े हुओं का (अपने आप परमात्मा के साथ) मिलाप नहीं हो सकता।
ਕਿਉ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਐ ਜਮ ਡਰਿ ਮਰੀਐ ਜਮ ਕਾ ਪੰਥੁ ਦੁਹੇਲਾ ॥
हे मेरे मन ! इस संसार-समुंद्र से पार लांघना बहुत मुश्किल है। (अपने उद्यम से) पार नहीं लांघा जा सकता। जमों के डर से सहम बना रहता है।
ਮਨਿ ਰਾਮੁ ਨਹੀ ਜਾਤਾ ਸਾਝ ਪ੍ਰਭਾਤਾ ਅਵਘਟਿ ਰੁਧਾ ਕਿਆ ਕਰੇ ॥
हे मेरे मन ! जमों की तरफ ले जाने वाला रास्ता बहुत दुखदाई है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने अपने मन में सवेरे शाम (किसी भी वक्त) परमात्मा के साथ सांझ नहीं डाली। वह (माया के मोह के) मुश्किल राह में फस जाता है (इसमें से निकलने के लिए) वह कुछ भी नहीं कर सकता। (पर हाँ।
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਇਨ ਬਿਧਿ ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵੈ ਨਰਹਰੇ ॥੧॥
माया के मोह की) रस्सी के साथ बँधा हुआ वह इस तरीके से निजात पा सकता है कि गुरू की शरण में आकर परमात्मा का सिमरन करे। 1।
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਤੂ ਛੋਡਿ ਆਲ ਜੰਜਾਲਾ ਰਾਮ ॥
हे मेरे मन ! घर के मोह के फंदों को छज्ञेड़ दे।
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਹਰਿ ਸੇਵਹੁ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਾਲਾ ਰਾਮ ॥
हे मेरे मन ! उस परमात्मा को सिमरता रह। जो सब में व्यापक भी है और निर्लिप भी है।