Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1100 (hindi)
ਨਾਨਕ ਸੇ ਅਖੜੀਆ ਬਿਅੰਨਿ ਜਿਨੀ ਡਿਸੰਦੋ ਮਾ ਪਿਰੀ ॥੩॥
हे नानक ! (तृष्णा-मारी आँखों से प्यारा प्रभू दिखाई नहीं दे सकता) वह आँखें (इन तृष्णा-ग्रसित आँखों से अलग) औैर ही किस्म की हैं। जिनसे प्यारा प्रभू-पति दिखाई देता है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨਿ ਸਭਿ ਸੁਖ ਪਾਈ ॥
जिस मनुष्य ने गुरू के सन्मुख हो के प्रभू को सिमरा है उसने सारे सुख पा लिए हैं।
ਓਹੁ ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਤਰਾਈ ॥
वह अपने परिवार समेत स्वयं भी (संसार-समुंद्र से) पार हो जाता है। सारे जगत को भी पार लगा लेता है।
ਓਨਿ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਧਨੁ ਸੰਚਿਆ ਸਭ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਈ ॥
उस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन इतना जोड़ा है कि माया वाली सारी ही तृष्णा उसने मिटा ली है।
ਓਨਿ ਛਡੇ ਲਾਲਚ ਦੁਨੀ ਕੇ ਅੰਤਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
उसने दुनिया के सारे लालच छोड़ दिए हैं (लालच में नहीं फसता) उसने प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ी हुई है।
ਓਸੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਘਰਿ ਅਨੰਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਸਖਾ ਸਹਾਈ ॥
उसके हृदय में सदा खुशी-आनंद है। प्रभू सदा उसका मित्र है सहायता करने वाला है।
ਓਨਿ ਵੈਰੀ ਮਿਤ੍ਰ ਸਮ ਕੀਤਿਆ ਸਭ ਨਾਲਿ ਸੁਭਾਈ ॥
उसने वैरी और मित्र एक-समान समझ लिए हैं (हरेक को मित्र समझता है)। सबके साथ अच्छा बरताव करता है।
ਹੋਆ ਓਹੀ ਅਲੁ ਜਗ ਮਹਿ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਜਪਾਈ ॥
वह मनुष्य गुरू से मिले उपदेश को सदा चेते रखता है और जगत में नामवाला हो जाता है।
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ॥੧੬॥
पिछले जन्मों में किए भले कर्मों के लेख उसके माथे पर उघड़ आते हैं और (इस जन्म में) परमात्मा के साथ बिल्कुल ही पक्की प्रीति बन जाती है। 16।
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे महला ५॥
ਸਚੁ ਸੁਹਾਵਾ ਕਾਢੀਐ ਕੂੜੈ ਕੂੜੀ ਸੋਇ ॥
हे नानक ! हर कोई कहता है कि (परमात्मा का) नाम-धन सुख देने वाला है और दुनियावी धन (के एकत्र करने) में कोई ना कोई झगड़े-दूषणबाजी वाली उपाधि वाली खबर ही सुनी जाती है। फिर भी।
ਨਾਨਕ ਵਿਰਲੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਜਿਨ ਸਚੁ ਪਲੈ ਹੋਇ ॥੧॥
ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं। जिन्होंने नाम-धन इकट्ठा किया हो (हर कोई उपाधि-मूल दुनियावी धन के पीछे ही दौड़ रहा है)। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਸਜਣ ਮੁਖੁ ਅਨੂਪੁ ਅਠੇ ਪਹਰ ਨਿਹਾਲਸਾ ॥
सोई हुई ने मैंने उस पति-प्रभू को (सपने में) देखा। सज्जन का मुँह बहुत ही अच्छा (लगा)।
ਸੁਤੜੀ ਸੋ ਸਹੁ ਡਿਠੁ ਤੈ ਸੁਪਨੇ ਹਉ ਖੰਨੀਐ ॥੨॥
हे सपने ! मैं तुझसे सदके जाती हूँ। (अब मेरी तमन्ना है कि) मैं आठों पहर (सज्जन का मुँह) देखती रहूँ। 2।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਸਜਣ ਸਚੁ ਪਰਖਿ ਮੁਖਿ ਅਲਾਵਣੁ ਥੋਥਰਾ ॥
हे मित्र ! (सिर्फ) मुँह से कहना व्यर्थ है। नाम-धन को (अपने हृदय में) परख।
ਮੰਨ ਮਝਾਹੂ ਲਖਿ ਤੁਧਹੁ ਦੂਰਿ ਨ ਸੁ ਪਿਰੀ ॥੩॥
अपने अंदर झाँक मार के देख। वह पति-प्रभू तुझसे दूर नहीं है (तेरे अंदर ही बसता है)। 3।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਧਰਤਿ ਆਕਾਸੁ ਪਾਤਾਲੁ ਹੈ ਚੰਦੁ ਸੂਰੁ ਬਿਨਾਸੀ ॥
धरती। आकाश। पाताल। चाँद और सूरज- ये सब नाशवंत हैं।
ਬਾਦਿਸਾਹ ਸਾਹ ਉਮਰਾਵ ਖਾਨ ਢਾਹਿ ਡੇਰੇ ਜਾਸੀ ॥
शाह-बादशाह अमीर जागीरदार (सब अपने) महल माढ़ियाँ छोड़ के (यहाँ से) चले जाएंगे।
ਰੰਗ ਤੁੰਗ ਗਰੀਬ ਮਸਤ ਸਭੁ ਲੋਕੁ ਸਿਧਾਸੀ ॥
कंगाल। अमीर। ग़रीब। मायाग्रसित (कोई भी हो) सारा जगत ही (यहाँ से) चला जाएगा।
ਕਾਜੀ ਸੇਖ ਮਸਾਇਕਾ ਸਭੇ ਉਠਿ ਜਾਸੀ ॥
काजी, शेख, सम्पन्न लोग सभी दुनिया से चले जाएँगे।
ਪੀਰ ਪੈਕਾਬਰ ਅਉਲੀਏ ਕੋ ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਾਸੀ ॥
पीर-पैग़बर बड़े-बड़े धार्मिक आगू - इनमें से कोई भी यहाँ सदा टिका नहीं रहेगा।
ਰੋਜਾ ਬਾਗ ਨਿਵਾਜ ਕਤੇਬ ਵਿਣੁ ਬੁਝੇ ਸਭ ਜਾਸੀ ॥
जिन्होंने रोज़े रखे। बाँगें दीं। नमाज़ें पढ़ीं। धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं। वह भी जिन्होंने इनकी सार ना समझी वह भी। सारे (जगत से आखिर) चले जाएंगें।
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮੇਦਨੀ ਸਭ ਆਵੈ ਜਾਸੀ ॥
धरती की चौरासी लाख जूनों के सारे ही जीव (जगत में) आते हैं और फिर यहाँ से चले जाते हैं।
ਨਿਹਚਲੁ ਸਚੁ ਖੁਦਾਇ ਏਕੁ ਖੁਦਾਇ ਬੰਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥੧੭॥
सिर्फ एक सच्चा ख़ुदा ही सदा कायम रहने वाला है। ख़ुदा का बँदा (भगत) भी जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता। 17।
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे महला ५॥
ਡਿਠੀ ਹਭ ਢੰਢੋਲਿ ਹਿਕਸੁ ਬਾਝੁ ਨ ਕੋਇ ॥
मैंने सारी सृष्टि तलाश के देख ली है। (हे प्रभू !) एक तेरे (दीदार के) बिना और कोई भी (पदार्थ मुझे आत्मिक शांति) नहीं (देता)।
ਆਉ ਸਜਣ ਤੂ ਮੁਖਿ ਲਗੁ ਮੇਰਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਠੰਢਾ ਹੋਇ ॥੧॥
हे मित्र प्रभू ! आ। तू मुझे दर्शन दे। (तेरे दर्शन करने से) मेरे तन मन में ठंढ पड़ती है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਆਸਕੁ ਆਸਾ ਬਾਹਰਾ ਮੂ ਮਨਿ ਵਡੀ ਆਸ ॥
(हे प्रभू !) (तेरे चरणों का सच्चा) प्रेमी वही हो सकता है जिसको दुनियावी आशा ना छू सकें।
ਆਸ ਨਿਰਾਸਾ ਹਿਕੁ ਤੂ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਗਈਆਸ ॥੨॥
पर मेरे मन में तो बड़ी-बड़ी आशाएं हैं। सिर्फ तू ही है जो मुझे (दुनियावी) आशाओं से उपराम कर सकता है। मैं तुझसे ही कुर्बान जाता हूँ (तू स्वयं ही मेहर कर)। 2।
ਮਃ ੫ ॥
महला ५॥
ਵਿਛੋੜਾ ਸੁਣੇ ਡੁਖੁ ਵਿਣੁ ਡਿਠੇ ਮਰਿਓਦਿ ॥
(प्रभू चरणों का अमल) प्रेमी वह है जिसको यह सुन के ही दुख प्रतीत हो कि प्रभू से विछोड़ा होने लगा है।
ਬਾਝੁ ਪਿਆਰੇ ਆਪਣੇ ਬਿਰਹੀ ਨਾ ਧੀਰੋਦਿ ॥੩॥
दीदार के बिना सच्चा प्रेमी आत्मिक मौत महसूस करता है। अपने प्यारे प्रभू से विछुड़ के प्रेमी का मन ठहरता नहीं (मन विहवल रहता है)। 3।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी।
ਤਟ ਤੀਰਥ ਦੇਵ ਦੇਵਾਲਿਆ ਕੇਦਾਰੁ ਮਥੁਰਾ ਕਾਸੀ ॥
देवताओं के मन्दिर। केदार मथुरा काशी आदि तीर्थ।
ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸਾ ਦੇਵਤੇ ਸਣੁ ਇੰਦ੍ਰੈ ਜਾਸੀ ॥
तैंतिस करोड़ देवते। इन्द्र देवता भी- आखिर नाशवंत हैं।
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਚਾਰਿ ਖਟੁ ਦਰਸ ਸਮਾਸੀ ॥
चार वेद स्मृतियां शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकों (के पढ़ने वाले) और छहों भेषों के साधु जन भी अंत में चले जाएंगे।
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਗੀਤ ਕਵਿਤ ਕਵਤੇ ਭੀ ਜਾਸੀ ॥
पुस्तकों के विद्वान। गीतों कविताओं के लिखने वाले कवि भी जगत से कूच कर जाएंगे।
ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੰਨਿਆਸੀਆ ਸਭਿ ਕਾਲੈ ਵਾਸੀ ॥
जती सती सन्यासी -ये सभी मौत के अधीन हैं।
ਮੁਨਿ ਜੋਗੀ ਦਿਗੰਬਰਾ ਜਮੈ ਸਣੁ ਜਾਸੀ ॥
समाधियाँ लगाने वाले। जोगी। नांगे। जमदूत- ये भी नाशवंत हैं।
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਵਿਣਸਣਾ ਸਭ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸੀ ॥
(सिरे की बात) (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है वह नाशवंत है। हरेक ने अवश्य नाश हो जाना है।
ਥਿਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੋ ਸੇਵਕੁ ਥਿਰੁ ਹੋਸੀ ॥੧੮॥
सदा कायम रहने वाला केवल पारब्रहम परमेश्वर ही है। उसका भक्त ही पैदा होने-मरने से रहित हो जाता है। 18।
ਸਲੋਕ ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
श्लोक डखणे महला ५॥
ਸੈ ਨੰਗੇ ਨਹ ਨੰਗ ਭੁਖੇ ਲਖ ਨ ਭੁਖਿਆ ॥
उसको नंग की परवाह नहीं रहती चाहे सैकड़ों बार नंगा रहना पड़े। उसको भूख नहीं चुभती चाहे लाखों बार भूखा रहना पड़े।
ਡੁਖੇ ਕੋੜਿ ਨ ਡੁਖ ਨਾਨਕ ਪਿਰੀ ਪਿਖੰਦੋ ਸੁਭ ਦਿਸਟਿ ॥੧॥
उसको कोई दुख नहीं व्यापता चाहे करोड़ों बार दुख व्यापें हे नानक ! (जिस मनुष्य की ओर) प्रभू-पति मेहर भरी निगाह से देखे।। 1।