Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1091 (hindi)
ਭੋਲਤਣਿ ਭੈ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹੇਕੈ ਪਾਧਰ ਹੀਡੁ ॥
वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है।
ਅਤਿ ਡਾਹਪਣਿ ਦੁਖੁ ਘਣੋ ਤੀਨੇ ਥਾਵ ਭਰੀਡੁ ॥੧॥
पर जलन और ईष्या के कारण बहुत ही दुख व्यापता है। मन। वाणी और शरीर तीनों ही भ्रष्ट हुए रहते हैं। 1।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਮਾਂਦਲੁ ਬੇਦਿ ਸਿ ਬਾਜਣੋ ਘਣੋ ਧੜੀਐ ਜੋਇ ॥
घणा धड़ा (भाव। बहुत सारी दुनिया) देखती है उस ढोल को (जो ढोल) वेदों ने बजाया (भाव। कर्म-काण्ड का रास्ता)।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਬੀਜਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
हे नानक ! तू 'नाम' सिमर। (इससे अलग) और दूसरा कोई (सही रास्ता) नहीं है। 2।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਸਾਗਰੁ ਗੁਣੀ ਅਥਾਹੁ ਕਿਨਿ ਹਾਥਾਲਾ ਦੇਖੀਐ ॥
(यह) त्रैगुणी (संसार) (मानो) अति-गहरा समुंद्र है। इसकी थाह किसने पाई है।
ਵਡਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਪਾਰਿ ਪਵਾ ॥
अगर सतिगुरू (जो इस त्रिगुणी संसार से) बहुत बेपरवाह है मिल जाए तो मैं भी इससे पार लांघ जाऊँ।
ਮਝ ਭਰਿ ਦੁਖ ਬਦੁਖ ॥
इस संसार-समुंद्र का बीच का हिस्सा दुखों से भरा हुआ है।
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਸੈ ਨ ਲਥੀ ਭੁਖ ॥੩॥
हे नानक ! प्रभू के नाम सिमरन के बिना किसी की भी (त्रैगुणी माया की) भूख नहीं उतरती। 3।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਜਿਨੀ ਅੰਦਰੁ ਭਾਲਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
सतिगुरू के सोहाने शबद से जिन्होंने अपना मन खोजा है
ਜੋ ਇਛਨਿ ਸੋ ਪਾਇਦੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
वह हरी-नाम सिमरते हैं और मन-इच्छित फल पाते हैं।
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करे उसको गुरू मिलता है और वह प्रभू के गुण गाता है।
ਧਰਮ ਰਾਇ ਤਿਨ ਕਾ ਮਿਤੁ ਹੈ ਜਮ ਮਗਿ ਨ ਪਾਵੈ ॥
धर्मराज उनका मित्र बन जाता है उनको वह जम के राह पर नहीं डालता;
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹਿ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧੪॥
वह दिन रात हरी-नाम सिमरते हैं और हरी-नाम में जुड़े रहते हैं। 14।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
श्लोक महला १॥
ਸੁਣੀਐ ਏਕੁ ਵਖਾਣੀਐ ਸੁਰਗਿ ਮਿਰਤਿ ਪਇਆਲਿ ॥
यही बात सुनी जाती है और बयान की जा रही है कि स्वर्ग में धरती पर और पाताल में (तीनों ही लोकों में) प्रभू एक स्वयं ही स्वयं है।
ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਈ ਮੇਟਿਆ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਨਾਲਿ ॥
उसके हुकम की उलंघना नहीं की जा सकती। (जीवों का) जो जो लेख उसने लिखा है वही (हरेक जीव को) चला रहा है। (सो। )
ਕਉਣੁ ਮੂਆ ਕਉਣੁ ਮਾਰਸੀ ਕਉਣੁ ਆਵੈ ਕਉਣੁ ਜਾਇ ॥
ना कोई मरता है ना कोई मारता है। ना कोई पैदा होता है ना कोई मरता है।
ਕਉਣੁ ਰਹਸੀ ਨਾਨਕਾ ਕਿਸ ਕੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
हे नानक ! वह खुद ही आनंद लेने वाला है। उसकी अपनी ही सुरति (अपने आप में) टिकी हुई है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
महला १॥
ਹਉ ਮੁਆ ਮੈ ਮਾਰਿਆ ਪਉਣੁ ਵਹੈ ਦਰੀਆਉ ॥
जितना समय जीव 'अहंकार' का मारा हुआ है उसके अंदर तृष्णा का दरिया बहता रहता है। पर।
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਥਕੀ ਨਾਨਕਾ ਜਾ ਮਨੁ ਰਤਾ ਨਾਇ ॥
हे नानक ! जब मन 'नाम' में रंगा जाता है तब तृष्णा समाप्त हो जाती है।
ਲੋਇਣ ਰਤੇ ਲੋਇਣੀ ਕੰਨੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥
आँखें अपने आप में रंगी जाती हैं। (निंदा आदि) सुनने की चाहत कानों में ही लीन हो जाती है।
ਜੀਭ ਰਸਾਇਣਿ ਚੂਨੜੀ ਰਤੀ ਲਾਲ ਲਵਾਇ ॥
जीभ 'नाम' सिमर के नाम रसायन में रंग के सुंदर लाल बन जाती है।
ਅੰਦਰੁ ਮੁਸਕਿ ਝਕੋਲਿਆ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
मन ('नाम' में) महक के लपटें देता है। (ऐसे जीवन वाले का) मूल्य नहीं पड़ सकता। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਨਾਮੋ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ॥
मनुष्य जनम में (जीव के लिए परमात्मा का) नाम ही (असल) खजाना है। 'नाम' ही (यहाँ से मनुष्य के) साथ जाता है।
ਏਹੁ ਅਖੁਟੁ ਕਦੇ ਨ ਨਿਖੁਟਈ ਖਾਇ ਖਰਚਿਉ ਪਲੈ ॥
ये नाम-खजाना अमुक (ना खत्म होने वाला) है कभी समाप्त नहीं होता। बेशक खाओ। खरचो और साथ बाँध लो; (फिर।
ਹਰਿ ਜਨ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਜਮਕੰਕਰ ਜਮਕਲੈ ॥
इस खजाने वाले) भगत जन के पास जमकाल जमदूत भी नहीं आते।
ਸੇ ਸਾਹ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰਿਆ ਜਿਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਲੈ ॥
जिन्होंने नाम-धन इकट्टा किया है वही सच्चे शाह हैं सच्चे व्यापारी हैं।
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜਾ ਆਪਿ ਹਰਿ ਘਲੈ ॥੧੫॥
यह नाम-धन परमात्मा की मेहर से मिलता है जब वह स्वयं (गुरू को जगत में) भेजता है। 15।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
श्लोक महला ३॥
ਮਨਮੁਖ ਵਾਪਾਰੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਬਿਖੁ ਵਿਹਾਝਹਿ ਬਿਖੁ ਸੰਗ੍ਰਹਹਿ ਬਿਖ ਸਿਉ ਧਰਹਿ ਪਿਆਰੁ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (असल) व्यापार की कद्र नहीं जानते। वे माया का सौदा करते हैं।
ਬਾਹਰਹੁ ਪੰਡਿਤ ਸਦਾਇਦੇ ਮਨਹੁ ਮੂਰਖ ਗਾਵਾਰ ॥
माया जोड़ते हैं और माया से ही प्यार करते हैं; वे बाहर से तो विद्वान कहलवाते हैं पर असल में मूर्ख हैं गावार हैं।
ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਇਨੀ ਵਾਦੀ ਧਰਨਿ ਪਿਆਰੁ ॥
(क्योंकि) वे प्रभू के साथ तो मन नहीं लगाते (विद्या के आसरे) चर्चा में प्यार करते हैं।
ਵਾਦਾ ਕੀਆ ਕਰਨਿ ਕਹਾਣੀਆ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਕਰਹਿ ਆਹਾਰੁ ॥
चर्चा की ही नित्य बातें करते हैं; और रोज़ी कमाते हैं झूठ बोल के।
ਜਗ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲਾ ਹੋਰੁ ਮੈਲਾ ਸਭੁ ਆਕਾਰੁ ॥
(असल बात यह है कि) नाम सिमरना ही जगत में (पवित्र काम) है। और जो कुछ दिखाई दे रहा है (इसका आहर) मैल पैदा करता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਨੀ ਹੋਇ ਮੈਲੇ ਮਰਹਿ ਗਵਾਰ ॥੧॥
हे नानक ! जो 'नाम' नहीं सिमरते वे मूर्ख नीच जीवन वाले हो के आत्मिक मौत सहते हैं। 1।
ਮਃ ੩ ॥
महला ३॥
ਦੁਖੁ ਲਗਾ ਬਿਨੁ ਸੇਵਿਐ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
(प्रभू का) सिमरन किए बिना मनुष्य को दुख व्यापता है। जब (प्रभू का) हुकम मानता है (भाव।
ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਸੁਖੈ ਦਾ ਆਪੇ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
रज़ा में चलता है) तो दुख दूर हो जाता है (क्योंकि प्रभू) खुद ही सुख देने वाला है और स्वयं ही सज़ा देने वाला है।
ਨਾਨਕ ਏਵੈ ਜਾਣੀਐ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥੨॥
हे नानक ! हुकम में चलने से ही ये समझ पड़ती है कि सब कुछ प्रभू की रज़ा में हो रहा है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜਗਤੁ ਹੈ ਨਿਰਧਨੁ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਾਹੀ ॥
प्रभू के 'नाम' के बिना जगत कंगाल है (क्योंकि चाहे कितनी ही माया इकट्ठी कर ले) 'नाम' के बिना संतोख नहीं आता; माया के मोह के कारण भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।
ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਪਾਹੀ ॥
अहंकार के कारण ही जीव दुख पाते हैं।