Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1086 (hindi)
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਜੁ ਅਚੁਤ ਸੁਆਮੀ ਦਰਗਹ ਸੋਭਾ ਪਾਵਣਾ ॥੩॥
उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर। प्रभू की हजूरी में (इस तरह) इज्जत मिलती है। 3।
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਦਸਾ ਸਿਧਿ ॥
हे भाई ! अगर तू चार पदार्थ चाहता है। अगर तू अठारह सिद्धियों की अभिलाषा रखता है।
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ॥
यदि तुझे दुनियां के नौ निधियाँ (नौ खजाने) चाहिए। यदि तुझे सारे सुख चाहिए।
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਜੇ ਮਨ ਮਹਿ ਚਾਹਹਿ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੁਆਮੀ ਰਾਵਣਾ ॥੪॥
तो गुरू को मिल के मालिक-प्रभू का सिमरन किया कर। ये हरी-नाम ही (असल) खजाना है। ये नाम ही आत्मिक अडोलता का सुख है। ये नाम ही चार-पदार्थ अठारह सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं। 4।
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਵਖਾਣੀ ॥
हे नानक ! (कह-) हे प्राणी ! शास्त्रों ने। स्मृतियों ने। वेदों ने कहा है कि
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜੀਤੁ ਪਰਾਣੀ ॥
अपने कीमती मानस जनम को सफल कर।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿੰਦਾ ਪਰਹਰੀਐ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਗਾਵਣਾ ॥੫॥
(पर ये सफल तब ही हो सकता है यदि) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाई जाए। सिफतसालाह की बरकति से ही काम छोड़ा जा सकता है। क्रोध त्यागा जा सकता है निंदा तजी जा सकती है (और इन विकारों को त्यागने में ही जनम की सफलता है)। 5।
ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਕੁਲੁ ਨਹੀ ਜਾਤੀ ॥
हे भाई ! जिस परमात्मा का (क्या) रूप। रेख। कुल और जाति (है- ये बात) बताई नहीं जा सकती।
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
जो परमात्मा दिन-रात हर वक्त सब जगह मौजूद है।
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਸੋਈ ਵਡਭਾਗੀ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਵਣਾ ॥੬॥
उस परमात्मा का नाम जो जो मनुष्य जपता है वह बहुत भाग्यशाली बन जाता है। वह मनुष्य बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 6।
ਜਿਸ ਨੋ ਬਿਸਰੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक बिसरा रहता है।
ਜਲਤਾ ਫਿਰੈ ਰਹੈ ਨਿਤ ਤਾਤਾ ॥
वह सदा (विकारों में) जलता फिरता है। वह सदा (क्रोध से) जला भुजा रहता है।
ਅਕਿਰਤਘਣੈ ਕਉ ਰਖੈ ਨ ਕੋਈ ਨਰਕ ਘੋਰ ਮਹਿ ਪਾਵਣਾ ॥੭॥
परमात्मा के किए उपकारों को भुलाने वाले उस मनुष्य को (इस बुरी आत्मिक दशा से) कोई बचा नहीं सकता। वह मनुष्य (सदा इस) भयानक नर्क में पड़ा रहता है। 7।
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਤਨੁ ਧਨੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ॥
हे नानक ! जिस परमात्मा ने जिंद दी। प्राण दिए। शरीर बनाया। धन दिया।
ਮਾਤ ਗਰਭ ਮਹਿ ਰਾਖਿ ਨਿਵਾਜਿਆ ॥
माँ के पेट में रक्षा करके बड़ी दया की।
ਤਿਸ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਛਾਡਿ ਅਨ ਰਾਤਾ ਕਾਹੂ ਸਿਰੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੮॥
जो मनुष्य उस परमात्मा का प्यार छोड़ के और ही पदार्थों के मोह में मस्त रहता है। वह मनुष्य किसी तरफ भी सिरे नहीं चढ़ता। 8।
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ॥
हे मेरे मालिक प्रभू ! (हम जीवों पर) दया किए रख।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਸਹਿ ਸਭਨ ਕੈ ਨੇਰੇ ॥
तू हरेक शरीर में बसता है। तू सब जीवों के नजदीक बसता है।
ਹਾਥਿ ਹਮਾਰੈ ਕਛੂਐ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਜਣਾਇਹਿ ਤਿਸੈ ਜਣਾਵਣਾ ॥੯॥
हम जीवों के बस में कुछ भी नहीं है। जिस मनुष्य को तू (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है। वही मनुष्य यह समझ हासिल करता है। 9।
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर हजूरी में से जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू ने अच्छे भाग्यों के लेख) लिख दिए होते हैं।
ਤਿਸ ਹੀ ਪੁਰਖ ਨ ਵਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥
सिर्फ उस मनुष्य पर ही माया अपना जोर नहीं डाल सकती।
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਸਰਣਾਈ ਦੂਸਰ ਲਵੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੧੦॥
हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। वे किसी और को परमात्मा के बराबर का नहीं समझते। 10।
ਆਗਿਆ ਦੂਖ ਸੂਖ ਸਭਿ ਕੀਨੇ ॥
हे भाई ! (जगत के) सारे दुख सारे सुख (परमात्मा ने अपने) हुकम में (आप ही) बनाए हैं।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਬਿਰਲੈ ਹੀ ਚੀਨੇ ॥
(इन दुखों से बचने के लिए) किसी विरले मनुष्य ने ही आत्मिक जीवन देने वाले हरी-नाम के साथ सांझ डाली है।
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ਜਤ ਕਤ ਓਹੀ ਸਮਾਵਣਾ ॥੧੧॥
हे भाई ! उस परमात्मा का मूल्य नहीं बताया जा सकता (वह परमात्मा किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिलता। वैसे) हर जगह वह स्वयं ही समाया हुआ है। 11।
ਸੋਈ ਭਗਤੁ ਸੋਈ ਵਡ ਦਾਤਾ ॥
हे भाई ! वह परमात्मा आप ही (अपने सेवक में बैठा अपनी) भगती करने वाला है। वह स्वयं ही सबसे बड़ा दातार है।
ਸੋਈ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
वह स्वयं ही सबमें व्यापक सृजनहार है। हे प्रभू ! जो (तेरा भक्त) तेरे मन में (तुझे) प्यारा लगता है।
ਬਾਲ ਸਹਾਈ ਸੋਈ ਤੇਰਾ ਜੋ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵਣਾ ॥੧੨॥
वही तेरा बाल सखा है (वही तुझे इस तरह प्यारा है जैसे कोई छोटी उम्र से एक साथ रहने वाले बालक एक-दूसरे को सारी उम्र प्यार करने वाले होते हैं)। 12।
ਮਿਰਤੁ ਦੂਖ ਸੂਖ ਲਿਖਿ ਪਾਏ ॥
हे भाई ! मौत दुख-सुख करतार ने स्वयं ही (जीवों के लेखों में) लिख के रख दिए हैं।
ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਬਧਹਿ ਘਟਹਿ ਨ ਘਟਾਏ ॥
ना ये बढ़ाने से तिल मात्र बढ़ते हैं। ना ही कम करने से कम होते हैं।
ਸੋਈ ਹੋਇ ਜਿ ਕਰਤੇ ਭਾਵੈ ਕਹਿ ਕੈ ਆਪੁ ਵਞਾਵਣਾ ॥੧੩॥
हे भाई ! जो कुछ करतार को अच्छा लगता है वही होता है। (यह) कह के (कि हम अपने आप कुछ कर सकते हैं) अपने आप को दुखी ही करना होता है। 13।
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਸੇਈ ਕਾਢੇ ॥
उनको ही परमात्मा माया के मोह के घोर अंधकार भरे कूएँ में से निकाल लेता है। और।
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਂਢੇ ॥
कई जन्मों के (अपने से) टूटे हुओं को (दोबारा अपने साथ) जोड़ लेता है।
ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਰਖੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਗੋਬਿੰਦੁ ਧਿਆਵਣਾ ॥੧੪॥
हे भाई ! परमात्मा कृपा करके जिन मनुष्यों को अपना बना लेता है। जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरते हैं।14।
ਤੇਰੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) तेरा मूल्य नहीं पाया जा सकता।
ਅਚਰਜ ਰੂਪੁ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
तेरा स्वरूप हैरान कर देने वाला है और तेरी वडिआई बड़ी है।
ਭਗਤਿ ਦਾਨੁ ਮੰਗੈ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵਣਾ ॥੧੫॥੧॥੧੪॥੨੨॥੨੪॥੨॥੧੪॥੬੨॥
तेरा सेवक (तेरे दर से) तेरी भक्ति की ख़ैर माँगता है। और तुझसे सदके जाता है कुर्बान जाता है। 15। 1। 14। 22। 24। 2। 14। 62।
ਮਾਰੂ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੩
मारू वार महला ३
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
श्लोक महला १॥
ਵਿਣੁ ਗਾਹਕ ਗੁਣੁ ਵੇਚੀਐ ਤਉ ਗੁਣੁ ਸਹਘੋ ਜਾਇ ॥
अगर कोई गाहक ना हो और (कोई) गुण (भाव। कोई कीमती पदार्थ) बेचें तो वह गुण सस्ते भाव में बिक जाता है। (भाव। उसकी कद्र नहीं पड़ती)। पर।
ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤਉ ਗੁਣੁ ਲਾਖ ਵਿਕਾਇ ॥
यदि गुण का गाहक मिल जाए तो वह बहुत कीमती बिकता है।