Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1082 (hindi)
ਆਪੇ ਸੂਰਾ ਅਮਰੁ ਚਲਾਇਆ ॥
वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है।
ਆਪੇ ਸਿਵ ਵਰਤਾਈਅਨੁ ਅੰਤਰਿ ਆਪੇ ਸੀਤਲੁ ਠਾਰੁ ਗੜਾ ॥੧੩॥
(सब जीवों के) अंदर उसने स्वयं ही सुख-शांति बरताई हुई है। (क्योंकि) वह स्वयं ओले (बर्फ के गोले) की तरह शीतल ठंढा-ठार है। 13।
ਜਿਸਹਿ ਨਿਵਾਜੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਜੇ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है। उसको गुरू की शरण में डाल के उसकी नई आत्मिक घाड़त घाड़ता है।
ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਤਿਸੁ ਅਨਹਦ ਵਾਜੇ ॥
उस (मनुष्य) के अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है (मानो) उसके अंदर एक-रस बाजे (बज पड़ते हैं)।
ਤਿਸ ਹੀ ਸੁਖੁ ਤਿਸ ਹੀ ਠਕੁਰਾਈ ਤਿਸਹਿ ਨ ਆਵੈ ਜਮੁ ਨੇੜਾ ॥੧੪॥
उसी मनुष्य को (सदा) आत्मिक आनंद प्राप्त रहता है। उसी को (परलोक में) आत्मिक अच्चता मिल जाती है। जमराज उसके नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर। आत्मिक मौत उस पर असर नहीं डाल सकती)। 14।
ਕੀਮਤਿ ਕਾਗਦ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥
कागजों पर (लिख कर) उसका मूल्य नहीं डाला जा सकता।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੇਅੰਤ ਗੁਸਾਈ ॥
हे नानक ! कह- सृष्टि का मालिक-प्रभू बेअंत है।
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਹਾਥਿ ਤਿਸੈ ਕੈ ਨੇਬੇੜਾ ॥੧੫॥
जगत के आरम्भ में। अब और अंत में भी वही कायम रहने वाला है। जीवों के कर्मों का फैसला उसी के हाथ में है। 15।
ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨਾਹੀ ਰੇ ਕੋਈ ॥
हे भाई ! कोई भी जीव उस (परमात्मा) के बराबर का नहीं है।
ਕਿਸ ਹੀ ਬੁਤੈ ਜਬਾਬੁ ਨ ਹੋਈ ॥
उसके किसी भी काम में किसी तरफ से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਆਪੇ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਚੋਜ ਖੜਾ ॥੧੬॥੧॥੧੦॥
नानक का प्रभू (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। वह स्वयं ही तमाशे कर-कर के खड़ा स्वयं ही देख रहा है। 16। 1। 10।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५॥
ਅਚੁਤ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
हे करतार ! तू अविनाशी है। तू पारब्रहम है। तू परमेश्वर है। तू अंतरजामी है।
ਮਧੁਸੂਦਨ ਦਾਮੋਦਰ ਸੁਆਮੀ ॥
हे स्वामी ! मधुसूदन और दामोदर भी तू ही है।
ਰਿਖੀਕੇਸ ਗੋਵਰਧਨ ਧਾਰੀ ਮੁਰਲੀ ਮਨੋਹਰ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੧॥
हे हरी ! तू ही ऋषिकेश गोवर्धन और मनोहर मुरलीवाला है। तू अनेकों रंग-तमाशे कर रहा है। 1।
ਮੋਹਨ ਮਾਧਵ ਕ੍ਰਿਸ੍ਨ ਮੁਰਾਰੇ ॥
हे हरी जीउ ! मेहन। माधव। कृष्ण मुरारी तू ही है।
ਜਗਦੀਸੁਰ ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੇ ॥
तू ही है जगत का मालिक। तू ही दैत्यों का नाश करने वाला।
ਜਗਜੀਵਨ ਅਬਿਨਾਸੀ ਠਾਕੁਰ ਘਟ ਘਟ ਵਾਸੀ ਹੈ ਸੰਗਾ ॥੨॥
हे जगजीवन ! हे अविनाशी ठाकुर ! तू सब शरीरों में मौजूद है। तू सबके साथ बसता है। 2।
ਧਰਣੀਧਰ ਈਸ ਨਰਸਿੰਘ ਨਾਰਾਇਣ ॥
हे धरती के आसरे ! हे ईश्वर ! तू ही है नरसिंह अवतार। तू है विष्णू जिसका निवास समुंद्र में है।
ਦਾੜਾ ਅਗ੍ਰੇ ਪ੍ਰਿਥਮਿ ਧਰਾਇਣ ॥
(वराह अवतार धार के) धरती को अपनी दाड़ों पर उठाने वाला भी तू ही है।
ਬਾਵਨ ਰੂਪੁ ਕੀਆ ਤੁਧੁ ਕਰਤੇ ਸਭ ਹੀ ਸੇਤੀ ਹੈ ਚੰਗਾ ॥੩॥
हे करतार ! (राजा बलि को छलने के लिए) तूने ही वामन-रूप धारण किया था। तू सब जीवों के साथ बसता है। (फिर भी तू सबसे) उक्तम है। 3।
ਸ੍ਰੀ ਰਾਮਚੰਦ ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ॥
हे प्रभू ! तू वह श्री रामचंद्र है जिसका ना कोई रूप है ना रेख।
ਬਨਵਾਲੀ ਚਕ੍ਰਪਾਣਿ ਦਰਸਿ ਅਨੂਪਿਆ ॥
तू ही है बनवाली और सुदर्शन चक्रधारी। तू बेमिसाल अलोकिक स्वरूप वाला है।
ਸਹਸ ਨੇਤ੍ਰ ਮੂਰਤਿ ਹੈ ਸਹਸਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸਭ ਹੈ ਮੰਗਾ ॥੪॥
तेरे हजारों नेत्र हैं। तेरी हजारों मूर्तियाँ हैं। तू ही अकेला दाता है। सारी दुनिया तुझसे माँगने वाली है। 4।
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅਨਾਥਹ ਨਾਥੇ ॥
हे अनाथों के नाथ ! तू भक्ति को प्यार करने वाला है !
ਗੋਪੀ ਨਾਥੁ ਸਗਲ ਹੈ ਸਾਥੇ ॥
तू ही गोपियों का नाथ है। तू सब जीवों के साथ रहने वाला है।
ਬਾਸੁਦੇਵ ਨਿਰੰਜਨ ਦਾਤੇ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਗੁਣ ਅੰਗਾ ॥੫॥
हे वासुदेव ! हे निर्लिप दातार ! मैं तेरे अनेकों गुण बयान नहीं कर सकता। 5।
ਮੁਕੰਦ ਮਨੋਹਰ ਲਖਮੀ ਨਾਰਾਇਣ ॥
हे मुक्ति के दाते ! हे सुंदर प्रभू ! हे लक्ष्मी के पति नारायण !
ਦ੍ਰੋਪਤੀ ਲਜਾ ਨਿਵਾਰਿ ਉਧਾਰਣ ॥
हे द्रोपदी को बेइज्जती से बचा के उसकी लाज रखने वाले !
ਕਮਲਾਕੰਤ ਕਰਹਿ ਕੰਤੂਹਲ ਅਨਦ ਬਿਨੋਦੀ ਨਿਹਸੰਗਾ ॥੬॥
हे लक्ष्मी के पति ! तू अनेकों करिश्मे करता है। तू सारे आनंद लेने वाला है। और निर्लिप भी है। 6।
ਅਮੋਘ ਦਰਸਨ ਆਜੂਨੀ ਸੰਭਉ ॥
हे फल देने से कभी ना उकताने वाले दर्शनों वाले प्रभू ! हे जूनि-रहित प्रभू ! हे अपने आप से प्रकाश करने वाले प्रभू !
ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਜਿਸੁ ਕਦੇ ਨਾਹੀ ਖਉ ॥
हे मौत-रहित स्वरूप वाले ! हे (ऐसे) प्रभू जिसका कभी नाश नहीं हो सकता !
ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਬਿਗਤ ਅਗੋਚਰ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਝ ਹੀ ਹੈ ਲਗਾ ॥੭॥
हे अविनाशी ! हे अदृष्ट ! हे अगोचर ! (जगत की) हरेक चीज़ तेरे ही आसरे है। 7।
ਸ੍ਰੀਰੰਗ ਬੈਕੁੰਠ ਕੇ ਵਾਸੀ ॥
हे लक्ष्मी के पति ! हे बैकुंठ के रहने वाले !
ਮਛੁ ਕਛੁ ਕੂਰਮੁ ਆਗਿਆ ਅਉਤਰਾਸੀ ॥
मॅछ और कछुए (आदि) का तेरी ही आज्ञा में अवतार हुआ।
ਕੇਸਵ ਚਲਤ ਕਰਹਿ ਨਿਰਾਲੇ ਕੀਤਾ ਲੋੜਹਿ ਸੋ ਹੋਇਗਾ ॥੮॥
हे सुंदर लंबे केशों वाले ! तू (सदा) अनोखे करिश्मे करता है। जो कुछ तू करना चाहता है वही अवश्य होता है। 8।
ਨਿਰਾਹਾਰੀ ਨਿਰਵੈਰੁ ਸਮਾਇਆ ॥
हे प्रभू ! तू अन्न खाए बिना जीवित रहने वाला है। तेरा किसी के साथ वैर नहीं। तू सबमें व्यापक है।
ਧਾਰਿ ਖੇਲੁ ਚਤੁਰਭੁਜੁ ਕਹਾਇਆ ॥
ये जगत-खेल रच के (तूने ही अपने आप को) ब्रहमा कहलवाया है।
ਸਾਵਲ ਸੁੰਦਰ ਰੂਪ ਬਣਾਵਹਿ ਬੇਣੁ ਸੁਨਤ ਸਭ ਮੋਹੈਗਾ ॥੯॥
हे प्रभू ! (कृष्ण जैसे) अनेकों साँवले-सुंदर रूप तू बनाता रहता है। तेरी बाँसुरी सुनते ही सारी सृष्टि मोहित हो जाती है। 9।
ਬਨਮਾਲਾ ਬਿਭੂਖਨ ਕਮਲ ਨੈਨ ॥
हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति तेरे आभूषण हैं।
ਸੁੰਦਰ ਕੁੰਡਲ ਮੁਕਟ ਬੈਨ ॥
हे कमल-पुष्प जैसी आँखों वाले ! हे सुंदर कुण्डलों वाले ! हे मुकट धारी ! हे बाँसुरी वाले !
ਸੰਖ ਚਕ੍ਰ ਗਦਾ ਹੈ ਧਾਰੀ ਮਹਾ ਸਾਰਥੀ ਸਤਸੰਗਾ ॥੧੦॥
हे शँखधारी ! हे चक्रधारी ! हे गदाधारी ! तू सत्संगियों का सबसे बड़ा सारथी (रथवाह। आगू) है। 10।
ਪੀਤ ਪੀਤੰਬਰ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਣੀ ॥
हे पीले वस्त्रों वाले ! हे तीनों भवनों के मालिक !
ਜਗੰਨਾਥੁ ਗੋਪਾਲੁ ਮੁਖਿ ਭਣੀ ॥
तू ही सारे जगत का नाथ है। सृष्टि का पालनहार है। मैं (अपने) मुँह से (तेरा नाम) उचारता हूँ।
ਸਾਰਿੰਗਧਰ ਭਗਵਾਨ ਬੀਠੁਲਾ ਮੈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਸਰਬੰਗਾ ॥੧੧॥
हे धर्नुधारी ! हे भगवान ! हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले ! मुझसे तेरे सारे गुण बयान नहीं हो सकते। 11।
ਨਿਹਕੰਟਕੁ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਕਹੀਐ ॥
हे भाई ! परमात्मा का कोई वैरी नहीं है। उसको वासना-रहित कहा जाता है
ਧਨੰਜੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਹੈ ਮਹੀਐ ॥
वही (सारे जगत के धन को जीतने वाला) धनंजय है। वह जल में है थल में है धरती पर (हर जगह) है।