Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1074 (hindi)
ਆਪੇ ਸਚੁ ਧਾਰਿਓ ਸਭੁ ਸਾਚਾ ਸਚੇ ਸਚਿ ਵਰਤੀਜਾ ਹੇ ॥੪॥
वह खुद ही सदा कायम रहने वाला है। सारे जगत को वह खुद ही सहारा देने वाला है। अपने सदा-स्थिर (नियमों के) द्वारा वह स्वयं ही जगत में वरतारा बरता रहा है। 4।
ਸਚੁ ਤਪਾਵਸੁ ਸਚੇ ਕੇਰਾ ॥
हे भाई ! सदा स्थिर परमात्मा का न्याय भी अॅटल (अभूल) है।
ਸਾਚਾ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰਾ ॥
हे प्रभू ! तेरा ठिकाना सदा कायम रहने वाला है।
ਸਚੀ ਕੁਦਰਤਿ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬ ਸੁਖੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੫॥
हे साहिब ! तेरी रची हुई कदरति और (उसकी) संरचना (बणतर) अॅटल नियमों वाली है। तूने स्वयं ही (इस कुदरति में) अटल सुख पैदा किया हुआ है। 5।
ਏਕੋ ਆਪਿ ਤੂਹੈ ਵਡ ਰਾਜਾ ॥
हे प्रभू ! सिर्फ तू स्वयं ही सबसे बड़ा राजा है।
ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਕੈ ਪੂਰੇ ਕਾਜਾ ॥
हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू के हुकम अनुसार सब जीवों के काम सफल होते हैं।
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਪਤੀਜਾ ਹੇ ॥੬॥
जो कुछ जीवों के अंदर घटित होता है जो कुछ बाहर सारे जगत में हो रहा है ये सब कुछ वह स्वयं ही जानता है। और संतुष्ट होता है। 6।
ਤੂ ਵਡ ਰਸੀਆ ਤੂ ਵਡ ਭੋਗੀ ॥
हे प्रभू ! (सबमें व्यापक हो के) तू सबसे बड़ा रस लेने वाला व भोग भोगने वाला है।
ਤੂ ਨਿਰਬਾਣੁ ਤੂਹੈ ਹੀ ਜੋਗੀ ॥
(निराकार होते हुए) तू स्वयं ही वासना रहित जोगी है।
ਸਰਬ ਸੂਖ ਸਹਜ ਘਰਿ ਤੇਰੈ ਅਮਿਉ ਤੇਰੀ ਦ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੭॥
हे प्रभू ! आत्मिक अडोलता के सारे आनंद तेरे घर में मौजूद हैं। तेरी मेहर की निगाह में अमृत बस रहा है। 7।
ਤੇਰੀ ਦਾਤਿ ਤੁਝੈ ਤੇ ਹੋਵੈ ॥
हे प्रभू ! जितनी दाति तू दे रहा है यह तू ही दे सकता है।
ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸਭਸੈ ਜੰਤ ਲੋਐ ॥
तू तो सारे लोकों में सब जीवों को दान दे रहा है।
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਪੂਰ ਭੰਡਾਰੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਰਹੇ ਆਘੀਜਾ ਹੇ ॥੮॥
तेरे भरे हुए खजाने में कभी घाटा नहीं पड़ सकता। सारे ही जीव (तेरी दातों की बरकति से) पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं। 8।
ਜਾਚਹਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਬਨਵਾਸੀ ॥
हे प्रभू ! जंगलों के वासी सिद्ध और साधिक (तेरे दर से ही) माँगते हैं।
ਜਾਚਹਿ ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੁਖਵਾਸੀ ॥
सुखी-रहने वाले जती और सती (भी तेरे दर से) माँगते हैं।
ਇਕੁ ਦਾਤਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਜਾਚਿਕ ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੯॥
तू एक दाता है। और सारी दुनिया (तेरे दर से) माँगने वाली है। तू सारी सृष्टि को दान देता है। 9।
ਕਰਹਿ ਭਗਤਿ ਅਰੁ ਰੰਗ ਅਪਾਰਾ ॥
हे भाई ! (अनेकों भक्त) बेअंत प्रभू की भक्ति करते हैं और आत्मिक आनंद पाते हैं।
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ॥
परमात्मा पैदा करके एक छिन में नाश करने की समर्था रखता है।
ਭਾਰੋ ਤੋਲੁ ਬੇਅੰਤ ਸੁਆਮੀ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਭਗਤੀਜਾ ਹੇ ॥੧੦॥
वह मालिक बेअंत ताकत वाला है बेअंत है। (जीव) उसका हुकम मान के उसके भगत बनते हैं। 10।
ਜਿਸੁ ਦੇਹਿ ਦਰਸੁ ਸੋਈ ਤੁਧੁ ਜਾਣੈ ॥
हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तू दर्शन देता है। वही तेरे साथ सांझ डालता है।
ਓਹੁ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਰੰਗ ਮਾਣੈ ॥
गुरू के शबद की बरकति से वह सदा आत्मिक आनंद पाता है।
ਚਤੁਰੁ ਸਰੂਪੁ ਸਿਆਣਾ ਸੋਈ ਜੋ ਮਨਿ ਤੇਰੈ ਭਾਵੀਜਾ ਹੇ ॥੧੧॥
वही मनुष्य (दरअसल) समझदार है सुंदर है बुद्धिवान है। जो तेरे मन को अच्छा लगता है। 11।
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
हे प्रभू ! जिस मनुष्य के चिक्त में तू आ बसता है उसको किसी की मुथाजी नहीं रहती।
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਹਾ ॥
वह सदा कायम रहने वाले (नाम-) धन का मालिक बन जाता है।
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਤਿਸੁ ਭਉ ਕੇਹਾ ਅਵਰੁ ਕਹਾ ਕਿਛੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੧੨॥
उसको किसी तरह का कोई डर नहीं रह जाता। कोई भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 12।
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੀ ਅੰਤਰੁ ਠੰਢਾ ॥
उसकी तृष्णा (की आग) बुझ गई उसका हृदय शांत हो गया।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤੂਟਾ ਗੰਢਾ ॥
हे भाई ! (प्रभू से) टूटे हुए जिस मनुष्य को पकड़ के पूरे गुरू ने (दोबारा प्रभू के संग) जोड़ दिया।
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਜਾਗੀ ਅਮਿਉ ਝੋਲਿ ਝੋਲਿ ਪੀਜਾ ਹੇ ॥੧੩॥
गुरू के शबद को सुरति में (टिकाने की सूझ उस मनुष्य के) हृदय में जाग उठी। वह मनुष्य बड़े स्वाद से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 13।
ਮਰੈ ਨਾਹੀ ਸਦ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵੈ ॥
वह आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता। वह सदा ही आत्मिक जीवन जीता है।
ਅਮਰੁ ਭਇਆ ਅਬਿਨਾਸੀ ਥੀਵੈ ॥
वह अटल आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। उसको मौत का सहम नहीं व्यापता।
ਨਾ ਕੋ ਆਵੈ ਨਾ ਕੋ ਜਾਵੈ ਗੁਰਿ ਦੂਰਿ ਕੀਆ ਭਰਮੀਜਾ ਹੇ ॥੧੪॥
हे भाई ! गुरू ने जिस मनुष्य की भटकना दूर कर दी। ऐसा मनुष्य जनम-मरण के चक्र से बच जाता है। 14।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਬਾਣੀ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू की पूरी बाणी से पूर्ण परमात्मा की याद में जुड़ता है।
ਪੂਰੈ ਲਾਗਾ ਪੂਰੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
वह उसमें समाया रहता है।
ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ਨਿਤ ਨਿਤ ਰੰਗਾ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਤੋਲੀਜਾ ਹੇ ॥੧੫॥
परमात्मा के प्रेम का रंग (उसके दिल में) सदा ही बढ़ता रहता है। पड़ताल करने से वह कभी भी कम नहीं होता। 15।
ਬਾਰਹਾ ਕੰਚਨੁ ਸੁਧੁ ਕਰਾਇਆ ॥
हे भाई ! वह मनुष्य बारह वंनी के (शुद्ध) सोने जैसा खरा हो जाता है।
ਨਦਰਿ ਸਰਾਫ ਵੰਨੀ ਸਚੜਾਇਆ ॥
वह सुंदर रंग वाला (सुंदर आत्मिक जीवन वाला) गुरू-सर्राफ की नज़रों में परवान हो जाता है।
ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਆ ਸਰਾਫੀ ਫਿਰਿ ਨਾਹੀ ਤਾਈਜਾ ਹੇ ॥੧੬॥
(जैसे शुद्ध सोने को) सर्राफ परख के खजाने में डाल लेते हैं। और उसको फिर परखने के लिए भट्ठी में डाला नहीं जाता (इस तरह वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल हो जाता है)। 16।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
हे नानक ! (कह-) हे मेरे मालिक प्रभू ! तेरा नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
तेरे दास तुझसे सदा सदके जाते हैं।
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਦੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੀਜਾ ਹੇ ॥੧੭॥੧॥੩॥
गुरू की संगति में रह के वह बहुत आत्मिक आनंद पाते हैं। (तेरा) दर्शन करके उनका ये मन (तेरे नाम-रस में) भीगा रहता है। 17। 1। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਸੋਲਹੇ
मारू महला ५ सोलहे
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਗੁਰੁ ਗੋਪਾਲੁ ਗੁਰੁ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
हे भाई ! (गुरू के सेवक के लिए) गुरू गोपाल (का रूप) है। गुरू गोविंद (का रूप) है।
ਗੁਰੁ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਬਖਸਿੰਦਾ ॥
गुरू दया का श्रोत है। गुरू सदा बख्शिश करने वाला है।
ਗੁਰੁ ਸਾਸਤ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਖਟੁ ਕਰਮਾ ਗੁਰੁ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਅਸਥਾਨਾ ਹੇ ॥੧॥
(सेवक के लिए) गुरू (ही) शास्त्र है। स्मृति है। छह धार्मिक कर्म है; गुरू ही पवित्र तीर्थ है। 1।