Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1070 (hindi)
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ਸਮਾਵੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਹੇ ॥੧੨॥
हे नानक ! गुरू के द्वारा नाम में ही लीन हो के वह मनुष्य (परमात्मा में) लीन रहता है। वह हर समय हरी-नाम ही सिमरता है। 12।
ਭਗਤਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
हे भाई ! भक्तों के मुँह में (गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली) बाणी टिकी रहती है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा का नाम (स्वयं) उच्चार के (औरों को भी) सुनाता है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਤ ਸਦਾ ਮਨੁ ਬਿਗਸੈ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसका मन सदा खिला रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में मन जोड़ के रखता है। 13।
ਹਮ ਮੂਰਖ ਅਗਿਆਨ ਗਿਆਨੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
हे प्रभू ! हम जीव मूर्ख हैं। अंजान हैं। हमें आत्मिक जीवन की कुछ भी सूझ नहीं है।
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਸਮਝ ਪੜੀ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
गुरू से (यह) समझ मन में पड़ती है।
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
हे प्रभू ! दयावान हो। मेहर करो। (हमें) गुरू की सेवा में लगाए रखो। 14।
ਜਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਾਤਾ ਤਿਨਿ ਏਕੁ ਪਛਾਤਾ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के साथ सांझ डाल ली। उसने एक परमात्मा को (इस प्रकार) पहचान लिया कि
ਸਰਬੇ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
वह सुखदाता प्रभू सबमें बस रहा है।
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
उस मनुष्य ने अपने जीवन को पड़ताल के सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया। उसकी सुरति परमात्मा की सेवा-भक्ति में टिकी रहती है। 15।
ਜਿਨ ਕਉ ਆਦਿ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥
हे भाई ! जिनको धुर-दरगाह से इज्जत मिलती है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
उनके मन में गुरू बसा रहता है। वे प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखते हैं।
ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਨਾਨਕ ਅੰਕਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
हे नानक ! (कह-) उनको जगत का सहारा दातार स्वयं आ के मिलता है। वे प्रभू की गोद में (प्रभू-चरणों में) समाए रहते हैं। 16। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੪ ॥
मारू महला ४॥
ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਸਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। इन्द्रियों की पहुँच से परे है। सदा ही नाश रहित है।
ਸਰਬੇ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਘਟ ਵਾਸੀ ॥
सब जीवों में व्यापक है। सब शरीरों में बसने वाला है।
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਤਿਸਹਿ ਸਰੇਵਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ਹੇ ॥੧॥
उसके बिना और कोई दाता नहीं है। हे प्राणी ! उसी परमात्मा का सिमरन किया करो। 1।
ਜਾ ਕਉ ਰਾਖੈ ਹਰਿ ਰਾਖਣਹਾਰਾ ॥ ਤਾ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਸਾਕਸਿ ਮਾਰਾ ॥
हे भाई ! बचाने की समर्था वाला परमात्मा जिस (मनुष्य) की रक्षा करता है। उसको कोई मार नहीं सकता।
ਸੋ ਐਸਾ ਹਰਿ ਸੇਵਹੁ ਸੰਤਹੁ ਜਾ ਕੀ ਊਤਮ ਬਾਣੀ ਹੇ ॥੨॥
हे संत जनो ! उस परमात्मा की सेवा भक्ति किया करो। उसकी सिफतसालाह की बाणी जीवन को ऊँचा कर देती है। 2।
ਜਾ ਜਾਪੈ ਕਿਛੁ ਕਿਥਾਊ ਨਾਹੀ ॥
हे भाई ! जब ये समझ आ जाती है कि कहीं भी कोई चीज (सदा-स्थिर) नहीं है।
ਤਾ ਕਰਤਾ ਭਰਪੂਰਿ ਸਮਾਹੀ ॥
तब करतार को हर जगह व्यापक समझो (जो सदा कायम रहने वाला है)।
ਸੂਕੇ ਤੇ ਫੁਨਿ ਹਰਿਆ ਕੀਤੋਨੁ ਹਰਿ ਧਿਆਵਹੁ ਚੋਜ ਵਿਡਾਣੀ ਹੇ ॥੩॥
हे भाई ! वह करतार सूखे को हरा-भरा करने वाला है। उस हरी का ही सिमरन करो। वह आश्चर्यजनक करिश्मे कर सकने वाला है। 3।
ਜੋ ਜੀਆ ਕੀ ਵੇਦਨ ਜਾਣੈ ॥
जो सब जीवों के दिल की पीड़ा जानता है।
ਤਿਸੁ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਹਉ ਕੁਰਬਾਣੈ ॥
हे भाई ! मैं तो उस परमात्मा मालिक से सदा सदके जाता हूँ।
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਜਨ ਕਰਿ ਬੇਨੰਤੀ ਜੋ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਕਾ ਦਾਣੀ ਹੇ ॥੪॥
हे भाई ! उस मालिक की हजूरी में अरदास किया कर। जो सारे सुखों को देने वाला है। 4।
ਜੋ ਜੀਐ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य (किसी और की) जिंद का दुख-दर्द नहीं समझ सकता।
ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਕਿਛੁ ਨ ਕਹੀਐ ਅਜਾਣੈ ॥
उस मूर्ख के साथ (अपने दुर्ख-दर्द की) कोई बात नहीं करनी चाहिए।
ਮੂਰਖ ਸਿਉ ਨਹ ਲੂਝੁ ਪਰਾਣੀ ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ਹੇ ॥੫॥
हे प्राणी ! उस मूर्ख से कोई गिला ना कर। सिर्फ परमात्मा का नाम जपना चाहिए। वही वासना-रहित आत्मिक दर्जा देने वाला है। 5।
ਨਾ ਕਰਿ ਚਿੰਤ ਚਿੰਤਾ ਹੈ ਕਰਤੇ ॥
हे भाई ! (रोजी की खातिर) चिंता-फिक्र ना कर। ये फिक्र करतार को है।
ਹਰਿ ਦੇਵੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਜੰਤਾ ਸਭਤੈ ॥
वह करतार जल में धरती में (बसने वाले) सब जीवों को (रिज़क) देता है।
ਅਚਿੰਤ ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਵਿਚਿ ਪਾਥਰ ਕੀਟ ਪਖਾਣੀ ਹੇ ॥੬॥
मेरा प्रभू वह वह दाति देता है जिसका हमें चिक्त-चेता भी नहीं होता। पत्थरों में बसने वाले कीड़ों को भी (रिज़क) देता है। 6।
ਨਾ ਕਰਿ ਆਸ ਮੀਤ ਸੁਤ ਭਾਈ ॥
हे भाई ! मित्र की। पुत्र की। भाई की- किसी की भी आस ना कर।
ਨਾ ਕਰਿ ਆਸ ਕਿਸੈ ਸਾਹ ਬਿਉਹਾਰ ਕੀ ਪਰਾਈ ॥
किसी शाह की। किसी व्यवहार की- कोई भी पराई आशा ना कर।
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਵੈ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਸਾਰੰਗਪਾਣੀ ਹੇ ॥੭॥
परमात्मा के नाम के बिना और कोई मददगार नहीं। उस परमात्मा का ही नाम जपना चाहिए। 7।
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਬਨਵਾਰੀ ॥
हे भाई ! हर वक्त परमात्मा का ही नाम जपते रहो।
ਸਭ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਪੂਰੈ ਥਾਰੀ ॥
वही तेरी हरेक आशा पूरी करता है। तेरा हरेक फुरना पूरा करता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਭਵ ਖੰਡਨੁ ਸੁਖਿ ਸਹਜੇ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ਹੇ ॥੮॥
हे दास नानक ! सदा हरी-नाम जपते रहो। हरी का नाम जनम-मरण के चक्करों का नाश करने वाला है। (जो मनुष्य जपता है उसकी) उम्र-रात्रि सुख में आत्मिक अडोलता बीतती है। ै8।
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की भक्ति की उसने सुख प्राप्त किया।
ਸਹਜੇ ਹੀ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥
वह बिना किसी (तप आदि) जतन के परमात्मा के नाम में लीन रहता है।
ਜੋ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਤਿਸ ਕੀ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਜਾਇ ਪੂਛਹੁ ਵੇਦ ਪੁਰਾਣੀ ਹੇ ॥੯॥
बेशक वेद-पुराणों (के पढ़ने वालों) से जा के पूछ लो। जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ता है। परमात्मा उसकी लाज रखता है। 9।
ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲਾਗੈ ॥
पर। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा की भक्ति में लगता है। जिसको परमात्मा स्वयं लगाता है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਭਰਮ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
गुरू के शबद की बरकति से उस मनुष्य की भटकना उसका डर दूर हो जाता है।
ਵਿਚੇ ਗ੍ਰਿਹ ਸਦਾ ਰਹੈ ਉਦਾਸੀ ਜਿਉ ਕਮਲੁ ਰਹੈ ਵਿਚਿ ਪਾਣੀ ਹੇ ॥੧੦॥
जैसे कमल-फूल पानी में (रह के भी पानी से) निर्लिप रहता है। वैसे ही वह मनुष्य गृहस्त में ही (माया से) सदा उपराम रहता है। 10।