Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1069 (hindi)
ਸਦ ਹੀ ਨੇੜੈ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣਹੁ ॥
हे भाई ! परमात्मा सदा ही (हमारे) नजदीक रहता है। उसको (कभी भी अपने से) दूर ना समझो।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਜੀਕਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
गुरू के शबद में जुड़ के उसको अपने अंग-संग बसता देखो।
ਬਿਗਸੈ ਕਮਲੁ ਕਿਰਣਿ ਪਰਗਾਸੈ ਪਰਗਟੁ ਕਰਿ ਦੇਖਾਇਆ ॥੧੫॥
हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को अपने साथ बसता देखता है उसका हृदय-) कमल फूल खिला रहता है। (उसके अंदर ईश्वरीय ज्योति की) किरण (आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर देती है। (गुरू उस मनुष्य को परमात्मा) प्रत्यक्ष करके दिखा देता है। 15।
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
हे नानक ! वह करतार स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है।
ਆਪੇ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਲੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
वह स्वयं ही मार के जीवित करता है (भाव। मारता भी खुद ही है। पैदा भी करता खुद ही है)। उसके बिना कोई और ऐसी समर्थता वाला है ही नहीं।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੧੬॥੨॥੨੪॥
हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) शोभा मिल जाती है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर कर के आत्मिक आनंद लेता रहता है। 16। 2। 24।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੪
मारू सोलहे महला ४
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਸਚਾ ਆਪਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही उसका जीवन सुंदर बनाने की समर्थता रखता है।
ਅਵਰ ਨ ਸੂਝਸਿ ਬੀਜੀ ਕਾਰਾ ॥
उसको (प्रभू की याद के बिना) कोई और दूसरी कार नहीं सूझती। पर।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसके हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 1।
ਸਭਨਾ ਸਚੁ ਵਸੈ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
हे भाई ! (वैसे तो) सदा-स्थिर प्रभू सब जीवों के मन में बसता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਹੀ ॥
पर गुरू की कृपा से ही (जीव) आत्मिक अडोलता में (टिक के प्रभू में) लीन होते हैं।
ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
गुरू को हर वक्त याद करते हुए मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। गुरू के चरणों में चिक्त जोड़े रखता है। 2।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਗਿਆਨੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਪੂਜਾ ॥
हे भाई ! गुरू आत्मिक जीवन की सूझ (देने वाला) है। गुरू परमात्मा की (भगती (सिखाने वाला) है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੀ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ॥
मैं तो गुरू की ही शरण पड़ता हूँ। कोई और दूसरा (मैं अपने मन में) नहीं (लाता)।
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਰਤਨ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਭਾਈ ਹੇ ॥੩॥
मैंने गुरू से श्रेष्ठ नाम-धन पाया है। मुझे गुरू की (बताई हुई) सेवा अच्छी लगती है। 3।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य गुरू को छोड़ के और तरफ लगते हैं।
ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ਭ੍ਰਮਿ ਮਰਹਿ ਅਭਾਗੇ ॥
वह अभागे व्यक्ति भटकना में पड़ कर आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕੀ ਫਿਰਿ ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹਹਿ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੪॥
हे नानक ! (कह-) उन मनुष्यों की ही फिर ऊँची आत्मिक अवस्था बनती है जो गुरू की शरण पड़ते हैं। 4।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਹੈ ਸਾਚੀ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसकी प्रभू से प्रीति पक्की होती है।
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਮਾਗਉ ਨਾਮੁ ਅਜਾਚੀ ॥
(वह हर समय इस प्रकार अरदास करता रहता है-) मैं गुरू से (तेरा) अमूल्य नाम माँगता हूँ।
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਖਿ ਲੇਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੫॥
हे हरी ! दयावान हो। कृपा कर। मुझे गुरू की शरण में रख। 5।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਚੁਆਇਆ ॥
हे भाई ! गुरू (जिस मनुष्य के हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पैदा करता है।
ਦਸਵੈ ਦੁਆਰਿ ਪ੍ਰਗਟੁ ਹੋਇ ਆਇਆ ॥
(परमात्मा) उसके सोच-मंडल में प्रकट हो जाता है।
ਤਹ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਵਜਹਿ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੬॥
उस अवस्था में उस मनुष्य के अंदर सिफत सालाह की बाणी से (इस प्रकार) आत्मिक आनंद पैदा होता है (जैसे। मानो वहाँ) पाँच किस्मों के साज़ बज रहे हैं। वह मनुष्य हर वक्त आत्मिक आनंद में लीन रहता है। 6।
ਜਿਨ ਕਉ ਕਰਤੈ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਈ ॥
पर। हे भाई ! (आत्मिक आनंद की यह दाति उन्हें ही मिलती है) जिनके भाग्यों में करतार ने धुर दरगाह से लिख के रख दी है।
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਵਿਹਾਈ ॥
उनकी उम्र सदा गुरू को याद करते हुए बीतती है।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋ ਸੀਝੈ ਨਾਹੀ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य (जिंदगी में) सफल नहीं होता। तू सदा गुरू के चरणों में अपना चिक्त जोड़े रख। 7।
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪੇ ਦੇਇ ॥
हे भाई ! जो जीव उस परमात्मा को प्यारा लगता है उसको वह स्वयं ही (नाम की दाति) देता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲੇਇ ॥
वह मनुष्य गुरू से यह कीमती नाम हासिल करता है।
ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਦੇਵੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੮॥
हे नानक ! (कह-) जिसके ऊपर वह प्रभू कृपा करता है उसको अपना नाम देता है। वह मनुष्य नाम में लीन रहता है। 8।
ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਰਗਟੁ ਭਇਆ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ सूझ उभर आई।
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਹਜੇ ਲਇਆ ॥
उसने आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा का कीमती नाम पा लिया।
ਏਹ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਈ ਹੇ ॥੯॥
पर यह वडिआई गुरू से (ही) मिलती है। मैं सदा ही गुरू से सदके जाता हूँ। 9।
ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਸੂਰੁ ਨਿਸਿ ਮਿਟਿਆ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
हे भाई ! (जैसे जब) सूरज चढ़ता है (तब) रात का अंधेरा मिट जाता है।
ਅਗਿਆਨੁ ਮਿਟਿਆ ਗੁਰ ਰਤਨਿ ਅਪਾਰਾ ॥
(इसी तरह) गुरू के बेअंत कीमती ज्ञान-रत्न से अज्ञान-अंधेरा दूर हो जाता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
हे भाई ! गुरू का (दिया हुआ) 'ज्ञान रत्न' बहुत ही कीमती है। परमात्मा की मेहर से जिसको यह मिलता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। 10।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਟੀ ਹੈ ਸੋਇ ॥
हे भाई ! गुरू के द्वारा जिसको हरी-नाम प्राप्त होता है। उसकी शोभा पसर जाती है।
ਚਹੁ ਜੁਗਿ ਨਿਰਮਲੁ ਹਛਾ ਲੋਇ ॥
वह सदा के लिए पवित्र जीवन वाला हो जाता है। वह सारे जगत में अच्छा माना जाता है।
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਮਿ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
हे भाई ! हर वक्त हरी-नाम में रंगे रहने के कारण वह सुख पाता है। वह हरी-नाम में हर वक्त सुरति जोड़े रखता है। 11।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा हरी-नाम हासिल होता है।
ਸਹਜੇ ਜਾਗੈ ਸਹਜੇ ਸੋਵੈ ॥
वह जागता और सोया हुआ हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है (आत्मिक अडोलता में जागता है आत्मिक अडोलता में सोता है)।