Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1066 (hindi)
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३॥
ਨਿਰੰਕਾਰਿ ਆਕਾਰੁ ਉਪਾਇਆ ॥
(उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) आकार-रहित परमात्मा ने (अपने आप से पहले) ये दिखाई देता जगत पैदा किया।
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੁਕਮਿ ਬਣਾਇਆ ॥
और माया का मोह भी उसने अपने हुकम में ही बना दिया।
ਆਪੇ ਖੇਲ ਕਰੇ ਸਭਿ ਕਰਤਾ ਸੁਣਿ ਸਾਚਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧॥
जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम (गुरू से) सुन के अपने मन में बसाता है (वह समझता है की) करतार स्वयं ही यह सारे खेल कर रहा है। 1।
ਮਾਇਆ ਮਾਈ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਪਰਸੂਤਿ ਜਮਾਇਆ ॥
(हे भाई ! हरी-नाम को अपने मन में बसाने वाला मनुष्य यह निश्चय रखता है कि) (जगत की) माँ माया से (जगत के पिता परमात्मा ने सारे) त्रैगुणी जीव पैदा किए (ब्रहमा। शिव आदि भी उसी ने पैदा किए)।
ਚਾਰੇ ਬੇਦ ਬ੍ਰਹਮੇ ਨੋ ਫੁਰਮਾਇਆ ॥
ब्रहमा को उसने चार वेद (रचने के लिए) हुकम किया।
ਵਰ੍ਹੇ ਮਾਹ ਵਾਰ ਥਿਤੀ ਕਰਿ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਸੋਝੀ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
वर्ष। महीने। वार। तिथिएं (आदि) बना के इस जगत में (समय आदि की) सूझ भी वह परमात्मा ही पैदा करने वाला है। 2।
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰ ॥
हे भाई ! (परमात्मा की मेहर से जिसको गुरू मिल गया) गुरू की शरण पड़ने से उसको ये श्रेष्ठ करने-योग्य कर्म मिल गया कि
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਰਾਖਹੁ ਉਰਿ ਧਾਰ ॥
परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखो। सो।
ਗੁਰਬਾਣੀ ਵਰਤੀ ਜਗ ਅੰਤਰਿ ਇਸੁ ਬਾਣੀ ਤੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
हे भाई ! इस जगत में (जिस मनुष्य के हृदय में) गुरू की बाणी आ बसती है। वह इस बाणी की बरकति से परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेता है। 3।
ਵੇਦੁ ਪੜੈ ਅਨਦਿਨੁ ਵਾਦ ਸਮਾਲੇ ॥
(पर। हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण से वंचित रह के वेद (आदि ही) पढ़ता है। और। हर वक्त चर्चा आदि ही करता है।
ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤੈ ਬਧਾ ਜਮਕਾਲੇ ॥
परमात्मा का नाम नहीं सिमरता वह आत्मिक मौत के बँधनों में बंधा रहता है।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਦਾ ॥੪॥
अन्य ही प्यार में फस के वह सदा दुख पाता है। माया के तीन गुणों की भटकना में पड़ के वह जीवन के गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। 4।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सिर्फ परमात्मा के साथ प्यार डालता है।
ਤ੍ਰਿਬਿਧਿ ਮਨਸਾ ਮਨਹਿ ਸਮਾਏ ॥
(इस तरह वह) माया के तीन गुणों के कारण पैदा होने वाले फुरनों को अपने मन में ही खत्म कर देता है।
ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਹੈ ਮੁਕਤਾ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਦਾ ॥੫॥
सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद की बरकति से वह मनुष्य (विकारों से) सदा बचा रहता है। (वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। 5।
ਜੋ ਧੁਰਿ ਰਾਤੇ ਸੇ ਹੁਣਿ ਰਾਤੇ ॥
पर। हे भाई ! इस मानस जन्म में वह मनुष्य ही नाम-रंग में रंगे रहते हैं जो (पूर्व जनम की की कमाई के अनुसार) धुर दरगाह से रंगे हुए होते हैं।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜੇ ਮਾਤੇ ॥
वे गुरू की कृपा से आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੬॥
हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य सदा प्रभू का मिलाप प्राप्त करे रखता है। वह अपने आप को (प्रभू के) आपे में मिला लेता है। 6।
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਭਰਮਿ ਨ ਪਾਏ ॥
हे भाई ! माया के मोह में। भटकना में फसा हुआ मनुष्य परमात्मा को नहीं मिल सकता।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਲਗਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥
और और प्यार में लगा हुआ मनुष्य दुख (ही) सहता है।
ਸੂਹਾ ਰੰਗੁ ਦਿਨ ਥੋੜੇ ਹੋਵੈ ਇਸੁ ਜਾਦੇ ਬਿਲਮ ਨ ਲਾਇਦਾ ॥੭॥
(कुसंभ के रंग की तरह माया का) शोख़-रंग थोड़े दिन ही रहता है। इसके फीका पड़ने में वक्त नहीं लगता। 7।
ਏਹੁ ਮਨੁ ਭੈ ਭਾਇ ਰੰਗਾਏ ॥
हे भाई ! जो मनुष्य (अपने) इस मन को परमात्मा के डर-अदब में प्यार में रहता है।
ਇਤੁ ਰੰਗਿ ਸਾਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਏ ॥
वह इस रंग में रंग के सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहता है।
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਕੋ ਇਹੁ ਰੰਗੁ ਪਾਏ ਗੁਰਮਤੀ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇਦਾ ॥੮॥
पर कोई विरला मनुष्य बड़ी किस्मत से ये प्रेम-रंग हासिल करता है। वह गुरू की मति पर चल कर यह रंग (अपने मन को) चढ़ाता है। 8।
ਮਨਮੁਖੁ ਬਹੁਤੁ ਕਰੇ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य बड़ा अहंकार करता है।
ਦਰਗਹ ਕਬ ਹੀ ਨ ਪਾਵੈ ਮਾਨੁ ॥
पर वह परमात्मा की हजूरी में कभी भी आदर नहीं पाता।
ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੯॥
और-और (मोह) में लग के वह अपना मानस जन्म गवा लेता है। सही जीवन की समझ के बिना वह सदा दुख पाता है। 9।
ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਅੰਦਰਿ ਆਪੁ ਲੁਕਾਇਆ ॥
हे भाई ! मेरे प्रभू ने अपने आप को (हरेक जीव के) अंदर गुप्त रखा हुआ है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇਆ ॥
(फिर भी) गुरू की कृपा से ही मिलाए मिलता है।
ਸਚਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਚਾ ਵਾਪਾਰਾ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
(जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह यह समझ लेता है कि) परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। उसका नाम जपना ही सही वाणज्य व्यापार है। (गुरू की कृपा से वह) कीमती हरी-नाम प्राप्त करि लेता है। 10।
ਇਸੁ ਕਾਇਆ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈ ॥
हे भाई ! (अपनी बुद्धि के आसरे) किसी व्यक्ति ने इस (मनुष्य-) शरीर की कद्र नहीं समझी।
ਮੇਰੈ ਠਾਕੁਰਿ ਇਹ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
मेरे मालिक प्रभू ने यही मर्यादा बना रखी है कि
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਾਇਆ ਸੋਧੈ ਆਪਹਿ ਆਪੁ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੧॥
जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह (अपने) शरीर को विकारों से बचाए रखता है। और स्वै भाव को अपने में ही लीन कर देता है। 11।
ਕਾਇਆ ਵਿਚਿ ਤੋਟਾ ਕਾਇਆ ਵਿਚਿ ਲਾਹਾ ॥
हे भाई ! (हरी-नाम से टूटने से) शरीर के अंदर (आत्मिक जीवन का) घाटा पड़ता जाता है (नाम में जुड़ने से) शरीर के अंदर (आत्मिक जीवन का) लाभ प्राप्त होता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜੇ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य बेपरवाह प्रभू को (अपने शरीर में) तलाशता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਣਜਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੨॥
नाम-व्यापार करके वह सदा सुख पाता है और हर वक्त अपने आप को आत्मिक अडोलता में टिकाए रखता है। 12।
ਸਚਾ ਮਹਲੁ ਸਚੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
हे भाई ! परमात्मा का ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। उसके खजाने (भी) सदा कायम रहने वाले हैं।
ਆਪੇ ਦੇਵੈ ਦੇਵਣਹਾਰਾ ॥
सब कुछ देने की समर्थता वाला परमात्मा स्वयं ही (जीवों को यह खजाने) देता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹੇ ਸੁਖਦਾਤੇ ਮਨਿ ਮੇਲੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सारे सुख देने वाला परमात्मा की सिफतसालाह करता है। उसको अपने मन में संभाल के रखता है। उस (के नाम) की कद्र समझता है। 13।
ਕਾਇਆ ਵਿਚਿ ਵਸਤੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
हे भाई ! मनुष्य के शरीर में ही नाम-पदार्थ है। पर मनुष्य इस की कद्र नहीं समझता।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
गुरू के सन्मुख करके (परमात्मा) स्वयं ही (अपने नाम की कद्र करने की) वडिआई महानता बख्शता है।
ਜਿਸ ਦਾ ਹਟੁ ਸੋਈ ਵਥੁ ਜਾਣੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਇ ਨ ਪਛੋਤਾਇਦਾ ॥੧੪॥
हे भाई ! इस परमात्मा का (बनाया हुआ यह मनुष्य-शरीर-) हाट है। वह (इसमें रखे हुए नाम-) पदार्थ (की कद्र) को जानता है। (वह प्रभू ये दाति) गुरू के माध्यम से देता है। (दे के) पछताता नहीं। 14।
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
हे भाई ! परमात्मा सब जीवों में व्यापक है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਇਆ ਜਾਈ ॥
(पर फिर भी वह) गुरू की कृपा से उसे मिलता है।
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਆਪੇ ਸਬਦੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੫॥
वह स्वयं ही (गुरू के साथ) मिला के (अपने साथ) मिलाता है। गुरू के शबद से (प्रभू जीव को) आत्मिक अडोलता में टिकाए रखता है। 15।