Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1029 (hindi)
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੀ ॥
(जिस भी मनुष्य ने गुरू की ओर मुँह किया उसको) प्रभू ने मेहर करके संसार-समुंद्र से पार लंघा लिया।
ਅਗਨਿ ਪਾਣੀ ਸਾਗਰੁ ਅਤਿ ਗਹਰਾ ਗੁਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਾ ਹੇ ॥੨॥
यह संसार एक बड़ा ही गहरा समुंद्र है इसमें पानी (की जगह विकारों की) आग (भड़क रही) है। इसमें से सतिगुरू ही पार लंघा सकता है। 2।
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੁਲੇ ਸੋਝੀ ਨਾਹੀ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाले और माया के मोह में अंधे हुए लोगों को (इस तृष्णा-अग्नि के समुंद्र की) समझ नहीं आती।
ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ਮਰਹਿ ਮਰਿ ਜਾਹੀ ॥
वे जनम-मरण के चक्कर में पड़ते हैं और बार-बार आत्मिक मौत मरते हैं।
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਨ ਮਿਟਈ ਜਮ ਦਰਿ ਅੰਧੁ ਖੁਆਰਾ ਹੇ ॥੩॥
(पर वे बिचारे भी क्या करें। ) पिछले जन्मों-जन्मांतरों के किए कर्मों के संस्कारों के लिखे लेख (जो उनके मन में उकरे हुए हैं) मिटते नहीं। माया के मोह में अंधा हुआ जीव जम के दर पर दुखी हेता है। 3।
ਇਕਿ ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ॥
(इसी तरह माया के मोह में फस के) अनेकों ही जीव पैदा होते हैं मरते हैं। पैदा होते हैं मरते हैं। पर अपने अंतरात्मे अडोलता नहीं प्राप्त कर सकते।
ਕਿਰਤ ਕੇ ਬਾਧੇ ਪਾਪ ਕਮਾਵਹਿ ॥
वे पिछले किए कर्मों के संस्कारों में बँधे हुए (और और) पाप किए जाते हैं।
ਅੰਧੁਲੇ ਸੋਝੀ ਬੂਝ ਨ ਕਾਈ ਲੋਭੁ ਬੁਰਾ ਅਹੰਕਾਰਾ ਹੇ ॥੪॥
माया का लोभ और अहंकार बड़ी बुरी बला है। इसमें अँधे हुए जीव को कोई सूझ-बूझ नहीं आ सकती (कि किस राह पर पड़ा हुआ है)। 4।
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਕਿਆ ਤਿਸੁ ਧਨ ਸੀਗਾਰਾ ॥
जो स्त्री। पति से विछुड़ी हुई हो उसका हार-श्रृंगार किस अर्थ का।
ਪਰ ਪਿਰ ਰਾਤੀ ਖਸਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ॥
उसने तो अपना पति बिसार रखा है और वह पराए मर्द से रंग-रलियाँ मनाती है। (ये हार-श्रृंगार उसको और भी ज्यादा नर्क में डालता है)।
ਜਿਉ ਬੇਸੁਆ ਪੂਤ ਬਾਪੁ ਕੋ ਕਹੀਐ ਤਿਉ ਫੋਕਟ ਕਾਰ ਵਿਕਾਰਾ ਹੇ ॥੫॥
जैसे किसी वैश्या के पुत्र के पिता का नाम नहीं बताया जा सकता (वह जगत में हास्यास्पद ही होता है। इसी तरह पति-प्रभू से विछुड़ी हुई जीव-स्त्री के) और-और किये हुए कर्म फोके और विकार ही हैं (इनमें से उसे मायूसी ही मिलती है)। 5।
ਪ੍ਰੇਤ ਪਿੰਜਰ ਮਹਿ ਦੂਖ ਘਨੇਰੇ ॥
(जो जीव प्रभू का नाम नहीं सिमरते वे। मानो। प्रेत-जून में हैं। उनके ये मानस शरीर भी प्रेत के रहने का पिंजर ही है) इन प्रेत-पिंजरों में वह बेअंत दुख सहते हैं।
ਨਰਕਿ ਪਚਹਿ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੇ ॥
अज्ञानता के अंधकार में पड़ कर वह (आत्मिक मौत के) नर्क में दुखी होते हैं।
ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੀ ਬਾਕੀ ਲੀਜੈ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ਹੇ ॥੬॥
जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया है (उसके सिर पर विकारों का कर्जा चढ़ जाता है। वह मनुष्य धर्मराज का करजाई हो जाता है) उससे धर्मराज के इस कर्जे की वसूली की जाती है (भाव। विकारों के कारण उसको दुख ही सहने पड़ते हैं)। 6।
ਸੂਰਜੁ ਤਪੈ ਅਗਨਿ ਬਿਖੁ ਝਾਲਾ ॥
(मनमुख के अंदर। मानो। माया के मोह का) सूरज तपता रहता है। उसके अंदर विषौली तृष्णा-अग्नि की लपटें निकलती रहती हैं।
ਅਪਤੁ ਪਸੂ ਮਨਮੁਖੁ ਬੇਤਾਲਾ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। मानो। भूत है (मनुष्य-शरीर होते हुए भी अंतरात्मे) पशु है। उसे कहीं आदर नहीं मिलता।
ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਰੋਗੁ ਬੁਰਾ ਬੁਰਿਆਰਾ ਹੇ ॥੭॥
जो लोग दुनियां की आशाओं और मन के मायावी फुरनों में फस के माया के मोह की कमाई ही करते रहते हैं। उनको (मोह का यह) अत्यंत बुरा रोग चिपका रहता है। 7।
ਮਸਤਕਿ ਭਾਰੁ ਕਲਰ ਸਿਰਿ ਭਾਰਾ ॥
जिस मनुष्य के माथे पर सिर पर (पापों के) कलॅर का बहुत सारा भार रखा हो।
ਕਿਉ ਕਰਿ ਭਵਜਲੁ ਲੰਘਸਿ ਪਾਰਾ ॥
वह संसार-समुंद्र में से कैसे पार लांघेगा।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਹੇ ॥੮॥
दुनिया के आरम्भ से ही जुगों में आदि से ही सतिगुरू जहाज है जो जीवों को परमात्मा के नाम में जोड़ के पार लंघा देता है। 8।
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਜਗਿ ਹੇਤੁ ਪਿਆਰਾ ॥
जगत में माया का मोह रूप पसारा पसरा हुआ है।
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
(सब जीवों का) पुत्र से स्त्री से मोह है प्यार है (पर यह मोह आत्मिक मौत का कारण बनता है)।
ਜਮ ਕੇ ਫਾਹੇ ਸਤਿਗੁਰਿ ਤੋੜੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੯॥
इस आत्मिक मौत के फंदे सतिगुरू ने (उस मनुष्य के गले में) तोड़ डाले हैं जो गुरू के सन्मुख रह के मूल-प्रभू को अपने सोच-मण्डल में टिकाता है। 9।
ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਚਾਲੈ ਬਹੁ ਰਾਹੀ ॥
जो जीव-स्त्री माया के मोह में (पड़ कर आत्मिक जीवन की पूँजी) लुटा बैठती है। वह (सही जीवन राह से भटक के) कई और राहों में भटकती फिरती है।
ਮਨਮੁਖੁ ਦਾਝੈ ਪੜਿ ਪੜਿ ਭਾਹੀ ॥
जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है वह तृष्णा की आग में पड़-पड़ कर जलता है (दुखी होता है)।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਗੁਰੂ ਵਡ ਦਾਣਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਸੁਖ ਸਾਰਾ ਹੇ ॥੧੦॥
(इस रोग से बचाने के लिए) गुरू (जो) बहुत समझदार (हकीम) है आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम देता है। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) नाम जपो (इसी में) श्रेष्ठ सुख है। 10।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਤੁਠਾ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
जिस मनुष्य पर गुरू प्रसन्न होता है उसके (हृदय में) सदा-स्थिर हरी-नाम पक्का कर देता है।
ਸਭਿ ਦੁਖ ਮੇਟੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
उसके सारे दुख मिटा देता है। उसको जिंदगी के सही रास्ते पर डाल देता है।
ਕੰਡਾ ਪਾਇ ਨ ਗਡਈ ਮੂਲੇ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਰਾਖਣਹਾਰਾ ਹੇ ॥੧੧॥
सतिगुरू जिस मनुष्य का रखवाला बनता है (जिंदगी के राहों में गुजरते हुए) उसके पैरों में काँटा नहीं चुभता (उसको अहंकार का काँटा दुखी नहीं करता)। 11।
ਖੇਹੂ ਖੇਹ ਰਲੈ ਤਨੁ ਛੀਜੈ ॥
अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पत्थर दिल ही रहता है कभी (भक्ति-भाव में) नहीं भीगता।
ਮਨਮੁਖੁ ਪਾਥਰੁ ਸੈਲੁ ਨ ਭੀਜੈ ॥
सारी उम्र माया के मोह में ही उसका शरीर आखिर नाश हो जाता है (उसका श्रेष्ठ मनुष्य जीवन) राख में मिल जाता है।
ਕਰਣ ਪਲਾਵ ਕਰੇ ਬਹੁਤੇਰੇ ਨਰਕਿ ਸੁਰਗਿ ਅਵਤਾਰਾ ਹੇ ॥੧੨॥
(जीवन का समय बीत जाने पर अगर वह) बहुत सारे तरले भी करे (तो किसी अर्थ के नहीं) वह कभी नर्क में और कभी स्वर्ग में पैदा ही होता रहता है (भाव। जनम-मरण के चक्कर में पड़ कर दुख-सुख भोगता रहता है)। 12।
ਮਾਇਆ ਬਿਖੁ ਭੁਇਅੰਗਮ ਨਾਲੇ ॥
(गुरू की शरण पड़े बिना) माया के मोह-रूपी साँप का जहर जीवों के अंदर टिका रहता है (और जीवों को आत्मिक मौत मारता रहता है)।
ਇਨਿ ਦੁਬਿਧਾ ਘਰ ਬਹੁਤੇ ਗਾਲੇ ॥
इसने दुविधा में डाल के अनेकों घर गला दिए हैं (मोह ने प्रभू के बिना और ही आसरों की झाक में पड़ कर अनेकों जीवन बर्बाद कर दिए हैं)।
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਉਪਜੈ ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਪਤੀਆਰਾ ਹੇ ॥੧੩॥
गुरू के बिना मनुष्य के हृदय में प्रभू-चरणों के प्रति प्रीति पैदा नहीं होती। जो मनुष्य (गुरू के द्वारा) परमात्मा के भक्ति-रंग में रंगे जाते हैं उनका मन प्रभू की याद में प्रसन्न रहता है। 13।
ਸਾਕਤ ਮਾਇਆ ਕਉ ਬਹੁ ਧਾਵਹਿ ॥
माया-ग्रसित जीव माया इकट्ठी करने की खातिर बहुत दौड़-भाग करते हैं (क्योंकि वे इसी में सुख तलाशने की आशा रखते हैं)
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ॥
पर परमात्मा का नाम भुला के आत्मिक आनंद कहाँ से ले सकते हैं।
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਅੰਤਰਿ ਖਪਹਿ ਖਪਾਵਹਿ ਨਾਹੀ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਾ ਹੇ ॥੧੪॥
वे माया के तीन गुणों में ही फसे रह के दुखी होते हैं (औरों को भी) दुखी करते हैं। दुखों के इस समुंद्र में से वे दूसरे छोर पर नहीं पहुँच सकते। 14।
ਕੂਕਰ ਸੂਕਰ ਕਹੀਅਹਿ ਕੂੜਿਆਰਾ ॥
निरे झूठ के व्यापारी व्यक्ति (देखने में तो मनुष्य हैं। पर दरअसल वे) कुत्ते और सूअर ही (अपने आपको कहलवाते हैं)
ਭਉਕਿ ਮਰਹਿ ਭਉ ਭਉ ਭਉ ਹਾਰਾ ॥
(क्योंकि कुक्तों और सूअरों की तरह माया की खातिर) भौंक-भौंक के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। सारी उम्र भटकते-भटकते थक टूट जाते हैं।
ਮਨਿ ਤਨਿ ਝੂਠੇ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਦੁਰਮਤਿ ਦਰਗਹ ਹਾਰਾ ਹੇ ॥੧੫॥
उनके मन में माया का मोह। उनके शरीर में माया का मोह। सारी उम्र वह मोह की कमाई ही करते हैं। इस बुरी मति के पीछे लग के परमात्मा की दरगाह में वे जीवन-बाज़ी हार जाते हैं। 15।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਮਨੂਆ ਟੇਕੈ ॥
अगर सतिगुरू मिल जाए तो मनुष्य को परमात्मा का नाम दे के उसके (डोलते) मन को सहारा देता है।
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਦੇ ਸਰਣਿ ਪਰੇਕੈ ॥
गुरू उसको परमात्मा का नाम-रूप अमूल्य (कीमती) धन देता है।
ਹਰਿ ਧਨੁ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਦੇਵੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਦਰਗਹ ਪਿਆਰਾ ਹੇ ॥੧੬॥
परमात्मा की सिफत-सालाह (की दाति) देता है (जिसकी बरकति से उसको) प्रभू की दरगाह में आदर-प्यार मिलता है। 16।