Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1028 (hindi)
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਮੁਕਤਿ ਕਰਾਏ ॥
(परमात्मा की मेहर से मिला हुआ) सतिगुरू आत्मिक जीवन के गुणों की दाति देता है। विकारों से बचाता है।
ਸਭਿ ਰੋਗ ਗਵਾਏ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਏ ॥
हमारे हृदय में अमृत-नाम का रस डाल के हमारे रोग दूर करता है।
ਜਮੁ ਜਾਗਾਤਿ ਨਾਹੀ ਕਰੁ ਲਾਗੈ ਜਿਸੁ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਠਰੁ ਸੀਨਾ ਹੇ ॥੫॥
(गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य की तृष्णा-अग्नि बुझ जाती है जिसकी छाती (नाम की ठंड से) ठंडी-ठार हो जाती है। जम-मसूलिया उसके नजदीक नहीं फटकता। उसको (जम का) कर नहीं देना पड़ता (क्योंकि उसको गुरू की किरपा से सिमरन के बिना और कोई मायावी वस्तु सौदा अपने जीवन-बेड़े में लादा ही नहीं)। 5।
ਕਾਇਆ ਹੰਸ ਪ੍ਰੀਤਿ ਬਹੁ ਧਾਰੀ ॥
यह काया (जैसे) एक सुंदर स्त्री है (पर जगत में आ के) पक्षी जीवात्मा काया-नारि से बहुत प्रीति बना लेता है।
ਓਹੁ ਜੋਗੀ ਪੁਰਖੁ ਓਹ ਸੁੰਦਰਿ ਨਾਰੀ ॥
यह जीवात्मा (मानो) एक जोगी है (जो जोगी वाली फेरी डाल के जगत से चला जाता है)।
ਅਹਿਨਿਸਿ ਭੋਗੈ ਚੋਜ ਬਿਨੋਦੀ ਉਠਿ ਚਲਤੈ ਮਤਾ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੬॥
रंग-रलियों में मस्त जोगी-जीवात्मा दिन-रात काया को भोगता है (दरगाह से संदेशा बुलावा आने पर) चलने के वक्त (जोगी-जीव काया नारि से) सलाह भी नहीं करता। 6।
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਰਹੇ ਪ੍ਰਭ ਛਾਜੈ ॥
जगत पैदा करके प्रभू सब जीवों की रक्षा करता है।
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਗਾਜੈ ॥
हवा पानी आग (आदि सब तत्वों से शरीर रच के सबके अंदर) प्रकट रहता है।
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦੂਤ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਸੋ ਪਾਏ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੭॥
(पर उस रखवाले प्रभू को भुला के) मूर्ख मन कामादिक वैरियों की संगति में मिल के भटकता है। और अपने किए का फल पाता है। 7।
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੋਖ ਦੁਖ ਸਹੀਐ ॥
परमात्मा का नाम भुला के दोखों (विकारों) में फस जाया जाता है दुख सहने पड़ते हैं।
ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਚਲਣਾ ਕਿਉ ਰਹੀਐ ॥
जब प्रभू का हुकम (बुलावा) आता है। यहाँ से चलना पड़ता है। फिर यहाँ रह ही नहीं सकते।
ਨਰਕ ਕੂਪ ਮਹਿ ਗੋਤੇ ਖਾਵੈ ਜਿਉ ਜਲ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਮੀਨਾ ਹੇ ॥੮॥
(परमात्मा की याद से टूट के सारी उम्र) नर्कों के कूएँ में गोते खाता रहता है (इस तरह तड़फता है) जैसे पानी से बाहर निकल के मछली (तड़फती है)। 8।
ਚਉਰਾਸੀਹ ਨਰਕ ਸਾਕਤੁ ਭੋਗਾਈਐ ॥
माया-ग्रसित जीव (परमात्मा को भुला के) चौरासी लाख जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है।
ਜੈਸਾ ਕੀਚੈ ਤੈਸੋ ਪਾਈਐ ॥
(सृजनहार की रजा का नियम ही ऐसा है कि) जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं।
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਕਿਰਤਿ ਬਾਧਾ ਗ੍ਰਸਿ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੯॥
गुरू की शरण पड़े बिना (चौरासी के चक्करों में से) मुक्ति नहीं होती। अपने किए कर्मों का बँधा जीव उस चक्कर में फंसा ही रहता है। 9।
ਖੰਡੇ ਧਾਰ ਗਲੀ ਅਤਿ ਭੀੜੀ ॥
(इस विकार भरे जगत में सही इन्सानी जीवन का रास्ता। मानो) एक बड़ी ही तंग गली (में से गुजरता है जहाँ बहुत ही संकोच करके संजोअ के चलना पड़ता) है (वह रास्ता। जैसे) खंडे की धार (जैसा तेज) है (जिसके ऊपर से गुजरते हुए थोड़ा सा भी डोलने से विकारों के समुंद्र में गिर जाते हैं)।
ਲੇਖਾ ਲੀਜੈ ਤਿਲ ਜਿਉ ਪੀੜੀ ॥
किए कर्मों का हिसाब भी पूरा करना पड़ता है (भाव। जब तक मन में विकारों के संस्कार मौजूद हैं। तब तक विकारों से मुक्ति नहीं मिलती) जैसे तिलों को (कोल्हू में) पीड़ने से ही तेल निकलता है (वैसे ही दुख के कोल्हू में पड़ कर विकारों से मुक्ति मिलती है)।
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਕਲਤ੍ਰ ਸੁਤ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੦॥
इस दुख में माता-पिता-पत्नी-पुत्र कोई भी सहायक नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम-रस की प्राप्ति के बिना (विकारों से) मुक्ति नहीं मिलती। 10।
ਮੀਤ ਸਖੇ ਕੇਤੇ ਜਗ ਮਾਹੀ ॥
जगत में (चाहे) अनेकों ही मित्र साथी (बना लें)।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪਰਮੇਸਰ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
पर गुरू के बिना परमात्मा के बिना (विकारों के समुंद्र में डूबते जीव का) कोई मददगार नहीं बनता।
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੁਕਤਿ ਪਰਾਇਣਿ ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੧॥
गुरू की बताई हुई सेवा ही (विकारों से) मुक्ति का आसरा बनता है। (जो व्यक्ति) हर वक्त प्रभू की सिफत सालाह करता है (वह विकारों से स्वतंत्र हो जाता है)। 11।
ਕੂੜੁ ਛੋਡਿ ਸਾਚੇ ਕਉ ਧਾਵਹੁ ॥
(हे भाई !) माया का मोह छोड़ के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मिलने का उद्यम करो (माया की ओर से नहीं तरसोगे)।
ਜੋ ਇਛਹੁ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵਹੁ ॥
जो कुछ (प्रभू-दर से) माँगोगे वही मिल जाएगा।
ਸਾਚ ਵਖਰ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ਵਿਰਲੇ ਲੈ ਲਾਹਾ ਸਉਦਾ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੨॥
(पर माया इतनी प्रबल है कि) सदा-कायम रहने वाले नाम-वस्तु के व्यापार वाले (जगत में) कोई एक-आध ही होते हैं। जो मनुष्य ये वाणज्य करता है वह (उच्च आत्मिक अवस्था का) लाभ कमा लेता है। 12।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਖਰੁ ਲੈ ਚਲਹੁ ॥
(हे भाई !) परमात्मा के नाम का सौदा (यहाँ से) खरीद के चलो।
ਦਰਸਨੁ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜਿ ਮਹਲਹੁ ॥
परमात्मा के दर्शन पाओगे। उसकी दरगाह से (वह दाति मिलेगी जिसकी बरकति से) अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहोगे।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹਹਿ ਜਨ ਪੂਰੇ ਇਉ ਸਮਦਰਸੀ ਚੀਨਾ ਹੇ ॥੧੩॥
जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे लोग (आत्मिक गुणों में) पूर्ण (हो के प्रभू का नाम-सौदा) हासिल कर लेते हैं। और इस तरह प्यार करने वाले परमात्मा को (अपने अंदर बसता ही) पहचान लेते हैं। 13।
ਪ੍ਰਭ ਬੇਅੰਤ ਗੁਰਮਤਿ ਕੋ ਪਾਵਹਿ ॥
कोई विरले (भाग्यशाली) लोग गुरू की मति ले कर बेअंत गुणों के मालिक परमात्मा को पा लेते हैं।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨ ਕਉ ਸਮਝਾਵਹਿ ॥
गुरू के शबद में जुड़ के (अपने) मन को (विकारों की तरफ दौड़ने से हटाने के लिए) समझाते हैं।
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਤਿ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਹੁ ਇਉ ਆਤਮ ਰਾਮੈ ਲੀਨਾ ਹੇ ॥੧੪॥
हे भाई ! सतिगुरू की बाणी में पूर्ण श्रद्धा बनाओ। इस तरह (भाव। गुरू की बाणी में श्रद्धा बनाने से) सर्व-व्यापक परमात्मा में लीन हुआ जाता है (और विकारों की ओर की दौड़ भटकना समाप्त हो जाती है)। 14।
ਨਾਰਦ ਸਾਰਦ ਸੇਵਕ ਤੇਰੇ ॥
हे प्रभू ! नारद (आदि बड़े-बड़े ऋषिगण) और शारदा (जैसी बेअंत देवियाँ) सब तेरे (ही दर के) सेवक हैं।
ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੇਵਕ ਵਡਹੁ ਵਡੇਰੇ ॥
इस त्रिभवनी संसार में बड़े से बड़े कहलवाने वाले भी तेरे दर के सेवक हैं।
ਸਭ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤਿ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਦਾਤਾ ਸਭੁ ਤੇਰੋ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੫॥
यह सारी रचना तेरी ही रची हुई है। यह सारा संसार तेरा ही बनाया हुआ है। तू हरेक जीव के सिर पर राज़क है। 15।
ਇਕਿ ਦਰਿ ਸੇਵਹਿ ਦਰਦੁ ਵਞਾਏ ॥
अनेकों ही जीव (तेरे नाम की बरकति से अपना) दुख-दर्द दूर करके तेरे दर पर तेरी सेवा-भक्ति करते हैं।
ਓਇ ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਛਡਾਏ ॥
जिनको सतिगुरू (विकारों के पँजे से) छुड़ा लेता है उनको परमात्मा की दरगाह में आदर-सत्कार मिलता है।
ਹਉਮੈ ਬੰਧਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਤੋੜੇ ਚਿਤੁ ਚੰਚਲੁ ਚਲਣਿ ਨ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੧੬॥
जिन (भाग्यशालियों) के अहंकासर के बँधन सतिगुरू ने तोड़ दिए। उनके चँचल मन को गुरू ने (विकारों की तरफ) भटकने नहीं दिया। 16।
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਹੁ ਚੀਨਹੁ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥
हे भाई ! तुम गुरू को मिलो। और (गुरू से) वह ढंग-तरीका सीख लो जिसकी सहायता से परमात्मा को मिल सको।
ਜਿਤੁ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਵਹੁ ਗਣਤ ਨ ਕਾਈ ॥
और कर्मों का लेखा भी कोई ना रह जाए। अपने अहंकार को मार कर गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करो।
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਕਰਹੁ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭੀਨਾ ਹੇ ॥੧੭॥੨॥੮॥
हे दास नानक ! (जो मनुष्य गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करता है) वह परमात्मा के प्रेम-रंग में भीग जाता है। 17। 2। 8।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १॥
ਅਸੁਰ ਸਘਾਰਣ ਰਾਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
हमारा परमात्मा (हमारे मनों में से कामादिक) दैत्यों का नाश करने में समर्थ है।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਮਈਆ ਰਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
वह प्यारा सुंदर राम हरेक शरीर में बसता है। हर वक्त हमारे अंदर मौजूद है।
ਨਾਲੇ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖੀਐ ਮੂਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਿਖੁ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
फिर भी वह अलख है। उसका स्वरूप बिल्कुल ही बयान नहीं किया जा सकता। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर उसके गुणों की विचार (अपने हृदय में) परो लो। 1।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
हे प्रभू ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के तेरी शरण पड़ते हैं वे अपने मन को साध लेते हैं (विकारों से रोक लेते हैं)।