Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 101 (hindi)
ਜੋ ਜੋ ਪੀਵੈ ਸੋ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ॥
(हे भाई !) जो परमात्मा के नाम का रस पीता है~ वह (दुनिया के पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाता है~
ਅਮਰੁ ਹੋਵੈ ਜੋ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪਾਵੈ ॥
जो नाम का रस प्राप्त करता है~उसे आत्मिक मौत कभी भी छूह नहीं सकती।
ਨਾਮ ਨਿਧਾਨ ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਜਿਸੁ ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਮਨਿ ਵੂਠਾ ਜੀਉ ॥੨॥
(पर प्रभू-) नाम के खजाने सिर्फ उसे मिलते हैं~ जिसके मन में गुरू का शबद आ बसता है।2।
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ਸੋ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਨਾ ॥
जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का रस चखा है~ वह पूर्ण तौर पे तृप्त हो गया है (उसकी माया वाली प्यास व भूख मिट चुकी है)।
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਸਾਦੁ ਪਾਇਆ ਸੋ ਨਾਹਿ ਡੁਲਾਨਾ ॥
जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है~ वह (माया के हमलों~ विकारों के हमलों के सन्मुख) कभी डोलता नहीं।
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੀਠਾ ਜੀਉ ॥੩॥
(पर) परमात्मा का यह नाम सिर्फ उस मनुष्य को मिलता है जिसके माथे के अच्छे भाग्य (जाग जाएं)।3।
ਹਰਿ ਇਕਸੁ ਹਥਿ ਆਇਆ ਵਰਸਾਣੇ ਬਹੁਤੇਰੇ ॥
हे नानक ! कह– जब यह हरि नाम एक (गुरू) के हाथ में आ जाता है तो (उस गुरू के पास से) अनेकों लोग लाभ उठाते हैं।
ਤਿਸੁ ਲਗਿ ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਘਣੇਰੇ ॥
उस (गुरू के) चरणों में लग के अनेकों ही मनुष्य (माया के बंधनों से) आजाद हो जाते हैं।
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਵਿਰਲੀ ਡੀਠਾ ਜੀਉ ॥੪॥੧੫॥੨੨॥
ये नाम खजाना गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है। विरलों (किसी किसी) ने ही (इस नाम खजाने के) दर्शन किए हैं।4।15।22।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
माझ महला ५ ॥
ਨਿਧਿ ਸਿਧਿ ਰਿਧਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੇਰੈ ॥
(हे भाई !) मेरे वास्ते तो परमात्मा का नाम ही दुनिया के नौ खजाने हैं। प्रभू नाम ही आत्मिक ताकतें हैं।
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੈ ॥
गहरे और बड़े जिगरे वाले परमात्मा की मेहर से मुझे मनुष्य जनम (दुर्लभ) पदार्थ (दिखाई दे रहा) है।
ਲਾਖ ਕੋਟ ਖੁਸੀਆ ਰੰਗ ਰਾਵੈ ਜੋ ਗੁਰ ਲਾਗਾ ਪਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
(पर ये नाम गुरू की कृपा से ही मिलता है) जो मनुष्य गुरू की चरणीं लगता है~ वह लाखों करोड़ों खुशियों का आनंद लेता है।1।
ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਭਏ ਪੁਨੀਤਾ ॥
(गुरू का) दीदार करके (मेरा तन मन) पवित्र हो गया है।
ਸਗਲ ਉਧਾਰੇ ਭਾਈ ਮੀਤਾ ॥
मेरे सारे भाई और मित्र (ज्ञानेंद्रियों को गुरू ने विकारों से) बचा लिये हैं।
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਸੁਆਮੀ ਅਪੁਨਾ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸਚੁ ਧਿਆਈ ਜੀਉ ॥੨॥
मैं गुरू की कृपा सेअपने उस मालिक को सिमर रहा हूँ~ जो अपहुँच है। जिस तक ज्ञान इंद्रियों की पहुँच नहीं है और जो सदा कायम रहने वाला है।2।
ਜਾ ਕਉ ਖੋਜਹਿ ਸਰਬ ਉਪਾਏ ॥ ਵਡਭਾਗੀ ਦਰਸਨੁ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਪਾਏ ॥
जिस परमात्मा को उसके पैदा किए सारे जीव ढूँढते रहते हैं~उसका दर्शन कोई बिरला ही भाग्यशाली मनुष्य प्राप्त करता है।
ਊਚ ਅਪਾਰ ਅਗੋਚਰ ਥਾਨਾ ਓਹੁ ਮਹਲੁ ਗੁਰੂ ਦੇਖਾਈ ਜੀਉ ॥੩॥
जो प्रभू सबसे ऊँची हस्ती वाला है~ जिसके गुणों का दूसरा छोर नहीं मिल सकता~ जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती~ उसका वह ऊँचा स्थान ठिकाना गुरू (ही) दिखाता है।3।
ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ॥
हे गहरे प्रभू ! हे बड़े जिगरे वाले प्रभू ! तेरा नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।
ਮੁਕਤਿ ਭਇਆ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਵਸੇਰਾ ॥
जिस मनुष्य के दिल में तेरा नाम बस जाता है~ वह विकारों से मुक्त हो जाता है।
ਗੁਰਿ ਬੰਧਨ ਤਿਨ ਕੇ ਸਗਲੇ ਕਾਟੇ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਜੀਉ ॥੪॥੧੬॥੨੩॥
हे नानक ! (जिनके हृदय में प्रभू नाम बसा है) गुरू ने उनके सारे माया के फाहे काट दिए हैं वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4।16।23।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
माझ महला ५ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਵਉ ॥
परमात्मा की मेहर से मैं परमातमा का नाम सिमरता हूँ~
ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆ ਤੇ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵਉ ॥
परमात्मा की ही कृपा से मैं परमातमा के सिफत सलाह के गीत गाता हूँ।
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਸਗਲ ਅਵਰਦਾ ਜੀਉ ॥੧॥
(हे भाई !) उठते बैठते सोते जागते सारी (ही) उम्र परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए।1।
ਨਾਮੁ ਅਉਖਧੁ ਮੋ ਕਉ ਸਾਧੂ ਦੀਆ ॥
परमातमा का नाम दारू (है~ जब) मुझे गुरू ने दिया
ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟੇ ਨਿਰਮਲੁ ਥੀਆ ॥
(इस की बरकति से मेरे सारे) पाप कट गए और मैं पवित्र हो गया।
ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਨਿਕਸੀ ਸਭ ਪੀਰਾ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੇ ਦਰਦਾ ਜੀਉ ॥੨॥
(मेरे अंदर आत्मिक) सुख पैदा हो गया। (मेरे अंदर से अहंकार की) सारी पीड़ा निकल गई। मेरे सारे दुख-दर्द दूर हो गए।2।
ਜਿਸ ਕਾ ਅੰਗੁ ਕਰੇ ਮੇਰਾ ਪਿਆਰਾ ॥ ਸੋ ਮੁਕਤਾ ਸਾਗਰ ਸੰਸਾਰਾ ॥
(हे भाई !) मेरा प्यारा (गुरू परमात्मा) जिस मनुष्य की सहायता करता है~वह इस संसार समुंद्र (के विकारों) से मुक्त हो जाता है।
ਸਤਿ ਕਰੇ ਜਿਨਿ ਗੁਰੂ ਪਛਾਤਾ ਸੋ ਕਾਹੇ ਕਉ ਡਰਦਾ ਜੀਉ ॥੩॥
जिस मनुष्य ने श्रद्धा धार के गुरू के साथ सांझ डाल ली~ उसे (इस समुंद्र से) डरने की जरूरत नहीं रह जाती।3।
ਜਬ ਤੇ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਪਾਏ ॥ ਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਉ ਗਈ ਬਲਾਏ ॥
(हे भाई !) जब से मुझे गुरू की संगति मिली है~
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਹਰਿ ਗਾਵੈ ਨਾਨਕੁ ਸਤਿਗੁਰ ਢਾਕਿ ਲੀਆ ਮੇਰਾ ਪੜਦਾ ਜੀਉ ॥੪॥੧੭॥੨੪॥
सतिगुरू ने (अहंकार आदि विकारों से बचा के) मेरी इज्जत रख ली है। अब नानक हरेक स्वास के साथ परमात्मा के गुण गाता है।4।17।24।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
माझ महला ५ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਸੇਵਕ ਸੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
(जैसे कपड़े का सूत) ओत प्रोत हो के परोया होता है (वैसे ही परमात्मा अपने) सेवक के साथ मिला रहता है।
ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੇ ਸੇਵਕ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
(जीवों को) सुख देने वाला प्रभू अपने सेवकों की रक्षा करता है।
ਪਾਣੀ ਪਖਾ ਪੀਸਉ ਸੇਵਕ ਕੈ ਠਾਕੁਰ ਹੀ ਕਾ ਆਹਰੁ ਜੀਉ ॥੧॥
(मेरी चाहत है कि) मैं प्रभू के सेवकों के दर पे पानी ढोऊँ~ पंखा फेरूँ और चक्की पीसूँ। (क्योंकि सेवकों को) पालणहार प्रभू (के सिमरन) का ही उद्यम रहता है।1।
ਕਾਟਿ ਸਿਲਕ ਪ੍ਰਭਿ ਸੇਵਾ ਲਾਇਆ ॥
प्रभू ने (जिसे उसकी माया की मोह की) फाही काट के अपनी सेवा भक्ति में जोड़ा है
ਹੁਕਮੁ ਸਾਹਿਬ ਕਾ ਸੇਵਕ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
उस सेवक के मन में मालिक प्रभू का हुकम प्यारा लगने लगता है।
ਸੋਈ ਕਮਾਵੈ ਜੋ ਸਾਹਿਬ ਭਾਵੈ ਸੇਵਕੁ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਮਾਹਰੁ ਜੀਉ ॥੨॥
वह सेवक वही कमाई करता है~ जो मालिक प्रभू को ठीक लगती है। वह सेवक नाम सिमरन में और जगत से प्रेम के साथ पेश आने में माहिर हो जाता है।2।
ਤੂੰ ਦਾਨਾ ਠਾਕੁਰੁ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਨਹਿ ॥
हे प्रभू ! (अपने सेवकों के दिल की) तू जानता है।~ तू (अपने सेवकों का) पालणहार है~ तू (सेवकों को माया के मोह से बचाने के) सब तरीके जानता है।