Sri Guru Granth Sahib Ji — Ang 1000 (hindi)
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५॥
ਮਾਨ ਮੋਹ ਅਰੁ ਲੋਭ ਵਿਕਾਰਾ ਬੀਓ ਚੀਤਿ ਨ ਘਾਲਿਓ ॥
हे भाई ! मान-मोह और लोभ आदि अन्य विकारों को परमात्मा का सेवक अपने चिक्त में नहीं आने देता।
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਗੁਣਾ ਹਰਿ ਬਣਜੇ ਲਾਦਿ ਵਖਰੁ ਲੈ ਚਾਲਿਓ ॥੧॥
वह सदा परमात्मा का नाम-रतन और परमात्मा की सिफत सालाह का व्यापार ही करता रहता है। यही सौदा वह यहाँ से लाद के ले के चलता है। 1।
ਸੇਵਕ ਕੀ ਓੜਕਿ ਨਿਬਹੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
हे भाई ! परमात्मा के भक्त की परमात्मा के साथ प्रीति आखिर तक बनी रहती है।
ਜੀਵਤ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵਿਓ ਅਪਨਾ ਚਲਤੇ ਰਾਖਿਓ ਚੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जितना समय वह जगत में जीता है उतना समय वह अपने मालिक-प्रभू की सेवा-भगती करता रहता है। जगत से जाने के वक्त भी प्रभू को अपने चिक्त में बसाए रखता है। 1। रहाउ।
ਜੈਸੀ ਆਗਿਆ ਕੀਨੀ ਠਾਕੁਰਿ ਤਿਸ ਤੇ ਮੁਖੁ ਨਹੀ ਮੋਰਿਓ ॥
हे भाई ! सेवक वह है जिसको मालिक-प्रभू ने जिस प्रकार का कभी हुकम किया। उसने उस हुकम से कभी मुँह नहीं मोड़ा।
ਸਹਜੁ ਅਨੰਦੁ ਰਖਿਓ ਗ੍ਰਿਹ ਭੀਤਰਿ ਉਠਿ ਉਆਹੂ ਕਉ ਦਉਰਿਓ ॥੨॥
अगर मालिक ने उसको घर के अंदर टिकाए रखा। तो सेवक के लिए वहीं ही आत्मिक अडोलता और आनंद बना रहता है; (अगर मालिक ने कहा-) उठ (उस तरफ की ओर जा। तो सेवक) उस तरफ की ओर दौड़ पड़ा। 2।
ਆਗਿਆ ਮਹਿ ਭੂਖ ਸੋਈ ਕਰਿ ਸੂਖਾ ਸੋਗ ਹਰਖ ਨਹੀ ਜਾਨਿਓ ॥
हे भाई ! अगर सेवक को मालिक प्रभू के हुकम में नंग-भूख आ गई। तो उसको ही उसने सुख मान लिया। सेवक खुशी अथवा ग़मी की परवाह नहीं करता।
ਜੋ ਜੋ ਹੁਕਮੁ ਭਇਓ ਸਾਹਿਬ ਕਾ ਸੋ ਮਾਥੈ ਲੇ ਮਾਨਿਓ ॥੩॥
सेवक को मालिक-प्रभू का जो जो हुकम मिलता है। उसको सिर-माथे मानता है। 3।
ਭਇਓ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਠਾਕੁਰੁ ਸੇਵਕ ਕਉ ਸਵਰੇ ਹਲਤ ਪਲਾਤਾ ॥
हे नानक ! मालिक-प्रभू जिस सेवक पर दयावान होता है। उसका यह लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
ਧੰਨੁ ਸੇਵਕੁ ਸਫਲੁ ਓਹੁ ਆਇਆ ਜਿਨਿ ਨਾਨਕ ਖਸਮੁ ਪਛਾਤਾ ॥੪॥੫॥
जिस सेवक ने पति-प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली। वह भाग्यशाली है। उसका दुनिया में आना सफल हो जाता है। 4। 5।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५॥
ਖੁਲਿਆ ਕਰਮੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਭਈ ਠਾਕੁਰ ਕੀਰਤਨੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗਾਈ ॥
हे भाई ! जिस मनुष्य पर मालिक प्रभू की मेहर होती है। वह सदा परमात्मा के सिफतसालाह के गीत गाता रहता है। उसके भाग्य जाग उठते हैं।
ਸ੍ਰਮੁ ਥਾਕਾ ਪਾਏ ਬਿਸ੍ਰਾਮਾ ਮਿਟਿ ਗਈ ਸਗਲੀ ਧਾਈ ॥੧॥
उसकी दौड़भाग खत्म हो जाती है। वह मनुष्य प्रभू-चरणों में ठिकाना पा लेता है। उसकी सारी भटकना दूर हो जाती है। 1।
ਅਬ ਮੋਹਿ ਜੀਵਨ ਪਦਵੀ ਪਾਈ ॥
अब मैंने आत्मिक जीवन वाला दर्जा प्राप्त कर लिया है।
ਚੀਤਿ ਆਇਓ ਮਨਿ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ਸੰਤਨ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हे भाई ! संत जनों की शरण पड़ने के कारण मेरे मन में मेरे चिक्त में सर्व-व्यापक सृजनहार प्रभू आ बसा है। 1। रहाउ।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਨਿਵਾਰੇ ਨਿਵਰੇ ਸਗਲ ਬੈਰਾਈ ॥
हे भाई ! (जो मनुष्य संतजनों की शरण पड़ता है वह अपने अंदर से) काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि सारे विकार) दूर कर लेता है। उसके ये सारे ही वैरी दूर हो जाते हैं।
ਸਦ ਹਜੂਰਿ ਹਾਜਰੁ ਹੈ ਨਾਜਰੁ ਕਤਹਿ ਨ ਭਇਓ ਦੂਰਾਈ ॥੨॥
सबको देखने वाला प्रभू उसको हर वक्त अंग-संग प्रतीत होता है। किसी भी जगह से उसको वह प्रभू दूर नहीं लगता। 2।
ਸੁਖ ਸੀਤਲ ਸਰਧਾ ਸਭ ਪੂਰੀ ਹੋਏ ਸੰਤ ਸਹਾਈ ॥
संत जन जिस मनुष्य के मददगार बनते हैं। उसके अंदर हर वक्त ठंड और आनंद बना रहता है। उसकी हरेक माँग पूरी हो जाती है।
ਪਾਵਨ ਪਤਿਤ ਕੀਏ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਮਹਿਮਾ ਕਥਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥੩॥
हे भाई ! संतों की महिमा बयान नहीं की जा सकती। संत जन विकारियों को एक छिन में पवित्र कर देते हैं। 3।
ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਸਗਲ ਭੈ ਖੋਏ ਗੋਬਿਦ ਚਰਣ ਓਟਾਈ ॥
हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा के चरणों का आसरा ले लिया। उनके सारे डर दूर हो गए। वे निर्भय हो गए।
ਨਾਨਕੁ ਜਸੁ ਗਾਵੈ ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੪॥੬॥
हे भाई ! नानक भी दिन-रात सुरति जोड़ के मालिक-प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है। 4। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५॥
ਜੋ ਸਮਰਥੁ ਸਰਬ ਗੁਣ ਨਾਇਕੁ ਤਿਸ ਕਉ ਕਬਹੁ ਨ ਗਾਵਸਿ ਰੇ ॥
हे भाई ! जो परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। जो सारे गुणों का मालिक है। तू उसकी सिफत सालाह कभी भी नहीं करता।
ਛੋਡਿ ਜਾਇ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਤਾ ਕਉ ਉਆ ਕਉ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਧਾਵਸਿ ਰੇ ॥੧॥
हे भाई ! उस (माया) को तो हर कोई एक छिन में छोड़ जाता है। तू भी उसी की खातिर बार-बार भटकता फिरता है। 1।
ਅਪੁਨੇ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਕਿਉ ਨ ਸਮਾਰਸਿ ਰੇ ॥
हे भाई ! तू अपने परमात्मा को क्यों याद नहीं करता।
ਬੈਰੀ ਸੰਗਿ ਰੰਗ ਰਸਿ ਰਚਿਆ ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਜੀਅਰਾ ਜਾਰਸਿ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू (माया के मोह-) वैरी के साथ मौज-मेलों के स्वाद में मस्त है। और। उस (मोह के) साथ ही अपनी जिंदगी को जला रहा है (अपने आत्मिक जीवन को जला रहा है)। 1। रहाउ।
ਜਾ ਕੈ ਨਾਮਿ ਸੁਨਿਐ ਜਮੁ ਛੋਡੈ ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਿ ਨ ਪਾਵਸਿ ਰੇ ॥
हे भाई ! जिस परमात्मा का नाम सुन के जमराज (भी) छोड़ जाता है। तू उसकी शरण (क्यों) नहीं पड़ता।
ਕਾਢਿ ਦੇਇ ਸਿਆਲ ਬਪੁਰੇ ਕਉ ਤਾ ਕੀ ਓਟ ਟਿਕਾਵਸਿ ਰੇ ॥੨॥
हे भाई ! तू अपने अंदर उस प्रभू का आसरा टिका ले। जो (शेर-प्रभू) बेचारे गीदड़ को निकाल देता है। 2।
ਜਿਸ ਕਾ ਜਾਸੁ ਸੁਨਤ ਭਵ ਤਰੀਐ ਤਾ ਸਿਉ ਰੰਗੁ ਨ ਲਾਵਸਿ ਰੇ ॥
हे भाई ! जिस परमात्मा का यश सुन के संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। तू उससे प्यार नहीं जोड़ता।
ਥੋਰੀ ਬਾਤ ਅਲਪ ਸੁਪਨੇ ਕੀ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਅਟਕਾਵਸਿ ਰੇ ॥੩॥
(माया की प्रीति) सपने समान ही तुच्छ सी बात है। पर तू मुड़-मुड़ के उसी में ही अपने मन को फसा रहा है। 3।
ਭਇਓ ਪ੍ਰਸਾਦੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਠਾਕੁਰ ਸੰਤਸੰਗਿ ਪਤਿ ਪਾਈ ॥
हे नानक ! कह- (हे भाई !) जिस मनुष्य पर कृपा के खजाने मालिक की मेहर होती है। वे संत जनों की संगति में रह कर (लोक-परलोक का) आदर कमाता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਭ੍ਰਮੁ ਛੂਟਾ ਜਉ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਸਹਾਈ ॥੪॥੭॥
जब प्रभू जी मददगार बनते हैं। मनुष्य की त्रैगुणी माया वाली भटकना दूर हो जाती है। 4। 7।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਨੈ ਤਿਸ ਤੇ ਕਹਾ ਦੁਲਾਰਿਓ ॥
हे मूर्ख ! सब के दिलों की जानने वाला परमात्मा (मनुष्य का) हरेक किस्म (का अंदरूनी भेद) जानता है। उससे कहाँ कुछ छुपाया जा सकता है।
ਹਸਤ ਪਾਵ ਝਰੇ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਅਗਨਿ ਸੰਗਿ ਲੈ ਜਾਰਿਓ ॥੧॥
(हे मूर्ख ! जिस शरीर की खातिर तू हरामखोरी करता है। वह शरीर अंत के समय) आग में डाल कर जलाया जाता है। (उसके) हाथ पैर (आदि अंग) एक छिन में जल के राख हो जाते हैं। 1।